July 8, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- प्रेग्नेंसी के आधार पर महिला IPS को ट्रेनिंग से क्यों रोकें?

गर्भवती महिला आईपीएस अधिकारियों की ट्रेनिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा।

New Delhi/Alive News: सुप्रीम कोर्ट ने गर्भवती महिला आईपीएस अधिकारियों को प्रशिक्षण से रोकने वाले 1993 के गृह मंत्रालय के नियम पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने पूछा कि यदि कोई महिला अधिकारी चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह फिट है, तो उसे केवल गर्भावस्था या मातृत्व के आधार पर प्रशिक्षण से क्यों रोका जाए।

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि महिलाओं के हित में बनाए गए नियमों का इस्तेमाल उनके अधिकार सीमित करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि सभी महिलाओं पर एक जैसा नियम लागू करना उचित नहीं है, क्योंकि हर महिला की स्वास्थ्य स्थिति अलग हो सकती है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर को जून 2026 से शुरू हुए प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है। इस मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी।

केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि यदि एक अधिकारी को छूट दी गई, तो भविष्य में अन्य अधिकारी भी इसी तरह की मांग कर सकते हैं। वहीं उर्वशी सेंगर की ओर से दलील दी गई कि पहले भी कुछ महिला अधिकारियों को ऐसे मामलों में राहत दी जा चुकी है।

उर्वशी सेंगर ने 1993 के गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन (OM) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने नवंबर 2023 में प्रशिक्षण शुरू किया था। अप्रैल 2025 में फेज-2 प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती होने पर उन्हें प्रशिक्षण बीच में छोड़ने और प्रसव के एक साल बाद अगले बैच के साथ दोबारा प्रशिक्षण लेने के लिए कहा गया।

बच्चे के जन्म के बाद सितंबर 2025 में उन्होंने मेडिकल फिटनेस के आधार पर दोबारा प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति मांगी, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी ने 1993 के नियम का हवाला देते हुए उनकी मांग अस्वीकार कर दी।

इसके बाद उर्वशी सेंगर ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) का रुख किया। CAT ने उन्हें मेडिकल औपचारिकताएं पूरी करने की शर्त पर प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी थी, लेकिन बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी।

याचिका में कहा गया है कि फेज-2 प्रशिक्षण मुख्य रूप से कक्षा आधारित और अकादमिक होता है, इसलिए केवल गर्भवती होने के आधार पर महिला अधिकारी को प्रशिक्षण से वंचित करना उचित नहीं है। इसमें यह भी मांग की गई है कि प्रशिक्षण से जुड़ा फैसला प्रत्येक अधिकारी की व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर लिया जाए, न कि सभी पर एक जैसा नियम लागू किया जाए।

गौरतलब है कि 23 अगस्त 1993 के गृह मंत्रालय के ज्ञापन के अनुसार, यदि कोई महिला आईपीएस अधिकारी प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती हो जाती है, तो उसका प्रशिक्षण रोक दिया जाएगा और वह प्रसव के एक साल बाद ही दोबारा प्रशिक्षण शुरू कर सकेगी।