October 18, 2021

राजनीति अर्थात राज करने के लिए जो नीतियां अपनाई जाए वही तो है राजनीति

राकेश शर्मा कुरुक्षेत्र

राजनीति में केवल आज राजनीतिक लोग केवल अपनी आकांक्षाओं और अपनी प्रबल इच्छाओं को पूरा करने के लिए दिन-रात प्रयासरत हैं। चुनावों के दौरान जनता के बीच में किए चुनावी वायदे जीतने के बाद हवा हवाई हो जाते हैं और जनता को उनके हालात पर छोड़ दिया जाता है। देश और समाज के लिए कुछ करने की लालसा रखने वाले लोगों को उसको समाज मौका ना देकर पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही राजनीतिक लोगो की बेल को आगे बढ़ाने में लगे हुए है।

राजनीति का खेल देश की जनता बखूबी देख रही है जान रही है आखिर क्या सत्ता की चाह पाने के लिए ही जनता की भावनाओं से खिलवाड़ हो रहा है। केवल आज राजनीति के बड़े-बड़े पदों पर विराजमान होने के लिए दांवपेच लगा रहे है। जिसको मिला खुश जिसको नही मिला नाखुश। जिसको अब जनता भी भली-भांति पहचान चुकी है। देश की जनता राजनीतिक दलों को वोट इसलिए देती है कि वह जनता के लिए कार्य करें उनके लिए ऐसी योजनाओं को धरातल पर लेकर आए जिससे जन- जन का भला हो सके। लेकिन सिर्फ कहने ओर भाषणों तक ही सीमित होता जा रहा है सब कुछ।

राजनीति में आने के लिए ना तो शिक्षा की जरूरत है और ना ही शारीरिक मापदंड की। देश की आजादी के 70 साल से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी जनता स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, चिकित्सा, पानी, बिजली, सड़क की लड़ाई सड़कों पर लड़ रही है। राजनीतिक दल केवल घोषणाओं और वायदों के सहारे अपनी राजनीति की नाव एक किनारे से दूसरे किनारे तक ले जाने के लिए जनता रूपी चप्पू का सहारा ले कर तैर रही है और जनता की समस्या रूपी पानी वही का वही ठहरा हुआ सा दिखाई दे रहा है। आज भी ना जाने कितने लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं के ना मिलने से दम तोड़ना पड़ता है। सड़क दुर्घटना में ना जाने कितने लोगों ने अपनों को खो दिया आज भी पीने के पानी की समस्या से छुटकारा नहीं मिला। ये समस्याएं हर रोज समाचार पत्रों की सुर्खियां बनती है। भारत को युवाओं का देश कहा जाता है।

लेकिन सबसे ज्यादा युवा ही बरोजगारी के दंश से मर रहा है। हर रोज ना जाने कितने बरोजगार युवा अपने हाथों में डिग्रियां लेकर नौकरी की तलाश में हर भटकता हुआ दिखाई देता है। यू तो इस विषय पर जितनी भी चर्चा की जाए या लिखा जाए उतना ही कम है मुद्दे की बात करें, तो आज की राजनीति केवल सत्ता सुख के लिए और जनता पर राज के लिए ही रह गई है इसमें शायद कोई अतिशोक्ति नही। समय के साथ साथ देश की राजनीति को बदलने की जरूरत महसूस की जा रही तभी तो मतदान केंद्रों पर जनता भी किसी भी उम्मीदवार को ना चुनकर नोटा का बटन दबाकर ही अपनी गुम आवाज को उठाने की कोशिश कर रही है। जो नेता जी जानते है और जनता भी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और उनके अपने विचार है )

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