New Delhi/Alive News: दिल्ली में 6 अप्रैल को एक अलग ही सियासी माहौल देखने को मिला, जब आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपने मामले में खुद पैरवी करने का फैसला किया। इस कदम को राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।
केजरीवाल ने कहा कि वह किसी वकील के जरिए नहीं, बल्कि खुद अदालत में अपनी बात रखेंगे। उनके इस फैसले को “जनता की आवाज़” के तौर पर पेश करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
इससे पहले ममता बनर्जी ने भी 4 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में खुद अपनी दलीलें रखी थीं। इसी वजह से दोनों नेताओं की रणनीति की तुलना की जा रही है।
सुनवाई के दौरान केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से केस से हटने की मांग भी की। इसे एक आक्रामक कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे एक तरफ निष्पक्षता पर सवाल उठाने का संदेश जाता है, लेकिन कानूनी रूप से यह जोखिम भरा भी हो सकता है।
वहीं, सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस कदम को “थिएट्रिक्स” बताया। उनका कहना है कि यह कानूनी लड़ाई कम और सहानुभूति पाने की कोशिश ज्यादा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जहां ममता बनर्जी इस तरह के कदम से केंद्र बनाम राज्य का मुद्दा उठाती हैं, वहीं केजरीवाल इसे एजेंसियों बनाम लोकतंत्र की लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं।
इस मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल 2026 को होगी। तब तक यह मुद्दा सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीति और मीडिया में भी चर्चा का विषय बना रहेगा।

