Noida/Alive News: सुबह आंख खुलते ही मोबाइल और रात को सोने से पहले तक स्क्रीन पर नजर टिकाए रखना अब लोगों का दिनचर्या बन चुका है और छुट्टी के दिन भी मोबाइल स्क्रीन से लॉगआउट नहीं होते है । लगातार ईमेल, मैसेज, ऑनलाइन मीटिंग और सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग का असर अब लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर साफ दिखने लगा है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार नोएडा में खासकर 25 से 40 वर्ष के कॉरपोरेट पेशेवरों में बर्नआउट के मामले बढ़ रहे हैं, जबकि 15 से 20 साल के किशोरों में एंजाइटी, भावनात्मक तनाव और मोबाइल की लत चिंता का कारण बन रही है।जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. स्वाति त्यागी ने बताया कि पहले लोगों को
मनोचिकित्सक की जरूरत कम पड़ती थी क्योंकि वह अपने परिवार के साथ रहते थे और अपने ऊपर भी पूरा ध्यान देते थे, लेकिन आज समय बढ़ने के साथ -साथ लोगों को मनोचिकित्सक की जरूरत भी पड़ने लगी है। खासकर कॉरपोरेट सेक्टर में काम कर रहे 25 से 40 उम्र के लोगों में क्योंकि अच्छी नौकरी, बेहतर वेतन और व्यवस्थित जीवन की इस दौड़ में वह अपने आप के लिए भी समय नहीं निकाल पा रहे है। ज्यादातर लोग ऑफिस से आने के बाद भी मोबाइल में ही लगे रहते है। हर व्यक्ति के लिए समय पर सोना और कम से भी कम सात घंटे की नींद लेना जरूरी होता है, नहीं तो वह हमेशा थकान, सर दर्द, समय – समय पर नींद आना और मानसिक तनाव में रहते है, जो कि
बर्नआउट की पहचान है। उन्होंने बताया कि किशोरों में भी घबराहट, एंजाइटी, मानसिक तनाव और मोबाइल एडिक्शन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। जिला अस्पताल की मानसिक स्वास्थ्य ओपीडी में प्रतिदिन 40 से 50 मरीज उपचार के लिए पहुंच रहे हैं।
क्या है बर्नआउट?
बर्नआउट शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक थकान की ऐसी स्थिति है, जो लंबे समय तक अत्यधिक तनाव और लगातार कार्य के दबाव में रहने के कारण विकसित होती है। समय रहते विशेषज्ञ से परामर्श और जीवनशैली में बदलाव कर इससे बचाव किया जा सकता है।

