New Delhi/Alive News: नगर निकाय (नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषद) चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि कोई प्रत्याशी चुनाव के दौरान झूठा हलफनामा दाखिल करता है, तो उसके खिलाफ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 की जगह भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी, बशर्ते संबंधित नगर निकाय कानून में इसके लिए अलग से दंड का प्रावधान न हो।
यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने गुजरात के वर्ष 2015 के नगर निकाय चुनाव से जुड़े एक मामले में सुनाया।
मामले में प्रत्याशी चंद्रिकाबेन किशोर दफदा पर आरोप था कि उन्होंने चुनावी हलफनामे में अपने पति की अचल संपत्तियों का विवरण छिपाया था। इस मामले में मजिस्ट्रेट ने उनके खिलाफ RPA की धारा 125A के तहत संज्ञान लिया था, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 2(डी) के अनुसार यह कानून केवल संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों पर लागू होता है। इसलिए नगर निकाय चुनावों में RPA की धारा 125A के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।
झूठा हलफनामा देने पर सजा से नहीं मिलेगी राहत
अदालत ने स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि नगर निकाय चुनाव में झूठा हलफनामा देने वाला उम्मीदवार कार्रवाई से बच जाएगा।
यदि संबंधित नगर निकाय कानून में दंड का प्रावधान नहीं है, तो ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता (IPC) की संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनावी हलफनामे में उम्मीदवार को अपनी, अपने जीवनसाथी और आश्रितों की सभी चल और अचल संपत्तियों की सही और पूरी जानकारी देना अनिवार्य है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्तियां ही नहीं, बल्कि पति या पत्नी के नाम पर व्यक्तिगत रूप से दर्ज संपत्तियों का भी खुलासा करना जरूरी है।
मामला फिर मजिस्ट्रेट के पास भेजा गया
सुप्रीम कोर्ट ने RPA के तहत दर्ज संज्ञान को रद्द करते हुए मामला दोबारा मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया है, ताकि उचित कानूनी प्रावधानों के तहत नए सिरे से कार्रवाई की जा सके।
अदालत ने यह भी कहा कि गलत कानूनी धारा के तहत संज्ञान लेना एक सुधार योग्य त्रुटि है। यदि इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित नहीं हुई है, तो केवल इसी आधार पर पूरी कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान झूठा हलफनामा दाखिल करना केवल व्यक्तिगत गलती नहीं, बल्कि समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ अपराध है। ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई होना आवश्यक है।

