थकान, भूख कम लगना, मतली, पेट में हल्का दर्द, कमजोरी या जोड़ों में दर्द के आ रहे 40 से 50 मरीज
Prabhjot/Alive News
Noida: लिवर को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाने वाली हेपेटाइटिस बीमारी आज भी बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार यह एक साइलेंट किलर है, क्योंकि शुरुआती दौर में इसके लक्षण या तो दिखाई नहीं देते या इतने सामान्य होते हैं कि मरीज उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। नतीजतन, अधिकांश मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब लिवर 70 से 80 प्रतिशत तक क्षतिग्रस्त हो चुका होता है। विश्व हेपेटाइटिस दिवस पर विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच, हेपेटाइटिस बी का टीकाकरण और जागरूकता ही इस जानलेवा बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।
सेक्टर-110 स्थित यथार्थ हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. नवीन कुमार ने बताया कि अस्पताल की ओपीडी में हर महीने 40 से 50 मरीज हेपेटाइटिस और अन्य पुरानी लिवर संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए आते हैं। हेपेटाइटिस-बी के टीकाकरण से युवाओं में नए संक्रमण के मामलों में कमी आई है, लेकिन आज भी कई ऐसे मरीज मिलते हैं जिन्हें वर्षों पहले संक्रमण हुआ था और उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं थी। वहीं, हेपेटाइटिस-सी के कई मामले नियमित हेल्थ चेकअप या सर्जरी से पहले होने वाली जांच के दौरान सामने आते हैं।
उन्होंने कहा कि हेपेटाइटिस को साइलेंट डिजीज कहा जाता है क्योंकि शुरुआती अवस्था में इसके स्पष्ट लक्षण नहीं होते। यदि लक्षण दिखाई भी देते हैं तो वे सामान्य थकान, भूख कम लगना, मतली, पेट में हल्का दर्द, कमजोरी या जोड़ों में दर्द जैसे होते हैं। 20 से 50 वर्ष की आयु के लोग सबसे अधिक प्रभावी हैं। डायलिसिस मरीजों, स्वास्थ्यकर्मियों, बार-बार रक्त चढ़वाने वाले मरीजों और उच्च जोखिम वाले व्यवहार अपनाने वाले लोगों को नियमित जांच करानी चाहिए।
फोर्टिस हॉस्पिटल के डायरेक्टर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी डॉ. महेश गुप्ता के अनुसार कि हेपेटाइटिस का अर्थ लिवर में सूजन है। इसके प्रमुख कारण हेपेटाइटिस ए, बी, सी और ई वायरस हैं। इसके अलावा अत्यधिक शराब का सेवन, कुछ दवाओं का लंबे समय तक उपयोग, ऑटोइम्यून रोग और फैटी लिवर भी इसकी वजह बन सकते हैं। समय पर उपचार नहीं मिलने पर यह बीमारी लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर और लिवर कैंसर जैसी गंभीर स्थितियों में बदल सकती है। संक्रमित रक्त या शारीरिक द्रव के संपर्क में आने वाले लोग, संक्रमित मां से जन्म लेने वाले शिशु, असुरक्षित इंजेक्शन का उपयोग करने वाले व्यक्ति और कमजोर प्रतिरक्षा क्षमता वाले लोगों में इसका खतरा अधिक रहता है।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के सीनियर डायरेक्टर गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी डॉ. संजय कुमार ने कहा कि हेपेटाइटिस को साइलेंट किलर बताते हुए कहा कि अधिकांश मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब पीलिया, अत्यधिक थकान या पेट दर्द जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं। उस समय तक लिवर 70 से 80 प्रतिशत तक क्षतिग्रस्त हो चुका होता है। उन्होंने बताया कि अस्पताल की पेट एवं लिवर ओपीडी में आने वाले कुल मरीजों में 10 से 15 प्रतिशत मामले हेपेटाइटिस या लिवर संक्रमण के होते हैं और बरसात के मौसम में इनकी संख्या बढ़ जाती है। बच्चों और युवाओं में दूषित भोजन-पानी, बढ़ता मोटापा, खराब जीवनशैली तथा टैटू या पियर्सिंग के दौरान बिना स्टरलाइज्ड सुई के इस्तेमाल के कारण संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। भारत में दूषित खानपान के कारण हेपेटाइटिस ए और ई सबसे आम हैं। लेकिन, हेपेटाइटिस बी सबसे बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि यह लंबे समय तक शरीर में रहकर लिवर कैंसर या लिवर फेलियर का कारण बन सकता है।
हेपेटाइटिस कैसे फैलता है
विशेषज्ञों के अनुसार हेपेटाइटिस-बी संक्रमित रक्त, असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित सुई, असुरक्षित चिकित्सा या कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं तथा संक्रमित मां से बच्चे में जन्म के दौरान फैल सकता है। वहीं, हेपेटाइटिस-सी मुख्य रूप से संक्रमित रक्त, असुरक्षित इंजेक्शन, बिना स्टरलाइज किए गए उपकरणों और पुराने समय में बिना पर्याप्त जांच किए गए ब्लड ट्रांसफ्यूजन के कारण फैलता है।
बचाव ही सबसे बड़ा इलाज
डॉक्टरों का कहना है कि हेपेटाइटिस-बी का टीका इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम है, जबकि हेपेटाइटिस-सी का अभी टीका उपलब्ध नहीं है, लेकिन समय पर पहचान होने पर इसका सफल इलाज संभव है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, शराब और धूम्रपान से दूरी, बिना डॉक्टर की सलाह दवा न लेना, रेजर या सुई जैसी व्यक्तिगत वस्तुएं साझा न करना तथा टैटू या मेडिकल प्रक्रियाएं केवल स्टरलाइज्ड उपकरणों से कराना संक्रमण से बचाव के लिए जरूरी है।

