New Delhi/Alive News: सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक, पाकिस्तान में बैठे आतंकी हैंडलर गुप्त बातचीत के लिए पोर्नोग्राफी वेबसाइट्स के चैट फीचर का इस्तेमाल कर रहे हैं। अधिकारियों का दावा है कि इन प्लेटफॉर्म के जरिए जम्मू-कश्मीर में सक्रिय या भर्ती किए गए लोगों तक संदेश पहुंचाने की कोशिश की जा रही है, ताकि सामान्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर होने वाली निगरानी से बचा जा सके।
अधिकारियों के अनुसार, कुछ पोर्नोग्राफी प्लेटफॉर्म पर रियल-टाइम चैट की सुविधा होती है। इन चैट टूल्स को आम तौर पर लोगों को आसपास मौजूद दूसरे यूजर्स से संपर्क कराने के लिए बनाया गया है। सुरक्षा एजेंसियों का आरोप है कि आतंकी हैंडलर इसी सुविधा का गलत इस्तेमाल गुप्त संदेश भेजने के लिए कर रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियों ने ऐसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म और मैसेजिंग टूल्स की जांच शुरू की है। अधिकारियों के मुताबिक, आतंकी हैंडलर एन्क्रिप्टेड और गुमनाम संचार की सुविधा देने वाले कुछ टोर-आधारित ऐप्स का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। इन प्लेटफॉर्म पर संदेशों को कई स्तरों वाली एन्क्रिप्शन व्यवस्था के जरिए भेजा जाता है, जिससे यूजर की पहचान का पता लगाना जांच एजेंसियों के लिए मुश्किल हो सकता है।
अधिकारियों के अनुसार, कुछ ऐसे ऐप्स भारत में प्रतिबंधित या सीमित पहुंच वाले हैं। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि इनका इस्तेमाल किस तरह आतंकी नेटवर्क के बीच संपर्क बनाए रखने के लिए किया जा रहा था।
विदेशी एन्क्रिप्टेड ऐप्स पर भी नजर
सुरक्षा एजेंसियों की जांच केवल एक तरह के ऐप तक सीमित नहीं है। अधिकारियों के मुताबिक, फ्रांस और वियतनाम से जुड़े कुछ मैसेजिंग प्लेटफॉर्म भी जांच के दायरे में हैं। इनमें ऐसे ऐप्स शामिल हैं, जिनमें फोन नंबर या सिम कार्ड के बिना भी एन्क्रिप्टेड बातचीत की सुविधा उपलब्ध होने का दावा किया जाता है।
एजेंसियां गुमनाम चैट प्लेटफॉर्म की भी निगरानी कर रही हैं। अधिकारियों के मुताबिक, कुछ प्लेटफॉर्म पर पारंपरिक रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया नहीं होती, जिससे यूजर की पहचान पता करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
VPN के जरिए प्रतिबंधित ऐप्स तक पहुंच का दावा
अधिकारियों का कहना है कि भारत में प्रतिबंधित या सीमित कुछ पोर्नोग्राफी ऐप्स तक VPN के जरिए पहुंचने की कोशिश भी की जा रही है। VPN यूजर के इंटरनेट कनेक्शन को एन्क्रिप्ट कर उसके वास्तविक नेटवर्क पते को छिपाने में मदद करता है। सुरक्षा एजेंसियां ऐसे माध्यमों के संभावित दुरुपयोग की भी जांच कर रही हैं।
2G नेटवर्क पर काम करने वाले ऐप्स का इस्तेमाल
जांच में यह भी सामने आया है कि आतंकी हैंडलर और जम्मू-कश्मीर में उनके संपर्क में रहने वाले लोग ऐसे ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे थे, जो धीमे इंटरनेट नेटवर्क पर भी काम कर सकें। अधिकारियों के मुताबिक, कुछ ऐप्स में अकाउंट बनाने के लिए फोन नंबर या ईमेल की जरूरत भी नहीं होती।
सुरक्षा एजेंसियों को यह जानकारी विदेशी कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली वर्चुअल सिम तकनीक के इस्तेमाल को रोकने की कोशिश के दौरान मिली। वर्चुअल सिम तकनीक के जरिए मोबाइल नेटवर्क से जुड़े संचार के लिए डिजिटल नंबरों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, इस तरह की तकनीक के दुरुपयोग का मामला पहले भी सामने आ चुका है। इसका जिक्र 2019 के पुलवामा आतंकी हमले की जांच के दौरान हुआ था। उस हमले में CRPF के 40 जवानों की मौत हुई थी।
सुरक्षा एजेंसियां अब इन डिजिटल प्लेटफॉर्म, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवाओं और संदिग्ध संचार नेटवर्क की जांच कर रही हैं। एजेंसियों का मुख्य उद्देश्य ऐसे नेटवर्क की पहचान करना और आतंकी गतिविधियों के लिए डिजिटल माध्यमों के संभावित इस्तेमाल को रोकना है।

