June 6, 2026

चुनाव खत्म, ‘वसूली’ शुरू? तेल का खेल और जनता की जेब पर डाका!

ये देश में क्या चल रहा है, अरे भाई करना क्या चाहते हो। कभी युवाओं से पकौड़े तलवाते हो तो कभी पकौड़े नही खाने की सलाह देते हो। आखिरकार देश के लोगों से कराना क्या चाहते हो।

एक बात और सुनिए! अगर आज आप कढ़ाई में छनते हुए तेल के पकौड़े खा रहे हैं, तो रुक जाइए… कहीं आप देशद्रोही तो नहीं? और सुनिए, वो जो अलमारी में थोड़ा-बहुत सोना छुपा कर रखा है ना? उसे तुरंत निकालिए और सरकार को दे दीजिए! क्योंकि बॉस, अब असली देशभक्त वही कहलाएगा जो अपना सब कुछ सरकार के हवाले कर देगा।

क्या हुआ? चौंक गए? भाई, चौंकिए मत! जब देश पर ‘ग्लोबल ऑयल शॉक’ का साया मंडरा रहा हो, तो आपकी जेब का कटना ही तो आपकी सबसे बड़ी देशभक्ति है!

अब हमारे देश के प्रधान सेवक की बात सुन लीजिए उन्होंने जनता से साफ-साफ कह दिया है— ‘तेल मत फूको!’ गाड़ियां घर पर खड़ी करो। मेट्रो से चलो, कारपूल करो, इलेक्ट्रिक गाड़ियां खरीदो और चुपचाप दो दिन घर बैठ कर ‘वर्क फ्रॉम होम’ करो। सरकार ने तो बाकायदा सरकारी दफ्तरों में आधी अटेंडेंस और ऑनलाइन मीटिंग्स के फरमान जारी कर दिए हैं।

इसकी वजह देश के हर नागरिक को पता है, लेकिन वजह समझ लीजिए, ईरान युद्ध और हमारा विदेशी मुद्रा भंडार। लेकिन सवाल यह है कि जब खाड़ी देशों में मिसाइलें चल रही थीं, तब सब ठीक था क्या? अचानक ऐसा क्या हुआ कि जैसे ही चुनाव के वोट पड़े, पेटियां बंद हुईं… और इधर पेट्रोल-डीजल के दाम ₹3 प्रति लीटर सीधे आसमान पर पहुंच गए?

विपक्ष तो अब सीधे-सीधे कह रहा है— ‘पहले वोट लो, फिर दाम बढ़ाओ!’ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने साफ लफ्ज़ों में कहा है: “गलती मोदी सरकार की, कीमत जनता चुकाएगी। ₹3 का झटका आ चुका है, बाकी की ‘वसूली’ किश्तों में होगी।”

जनता भी पूछ रही है कि साहब, इतनी बड़ी सरकार है, इतने बड़े-बड़े नीति-निर्माता हैं, क्या इनको आगे का बिल्कुल अंदाजा नहीं होता? जब महिला आरक्षण बिल लाना होता है, तब तो आधी रात को ढोल-नगाड़ों के साथ संसद चलती है, देश को बड़े-बड़े संबोधन होते हैं। तो तेल की इस महंगाई पर पहले से तैयारी क्यों नहीं थी? क्या सरकार को एकदम से पता चलता है कि देश घाटे में चल रहा है?

अब बीजेपी का तर्क भी सुन लीजिए। सरकार का कहना है कि दुनिया भर में हाहाकार मचा है, लेकिन भारत ने दो महीने तक अपने नागरिकों को बचाए रखा और सिर्फ 3% की ‘कैलिब्रेटेड’ यानी नापी-तोली बढ़ोतरी की है।
लेकिन इस ‘नापी-तोली’ बढ़ोतरी का गणित जानते हैं आप?

-दिल्ली में पेट्रोल अब सतानवें रूपये सत्तर पैसे (97.77) और डीजल नभे रूपये सत्तसठ पैसे (90.67) हो गया है।
-तेल कंपनियों को हर महीने तीस हजार करोड का नुकसान हो रहा था, और इस 3 रुपये की बढ़ोतरी से ओएमसी (OMCs) को महीने में सिर्फ चवालीस सौ उन्नचयास (4,449) करोड़ ही मिल पाएंगे।
इसका सीधा मतलब क्या है? एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि यह तो सिर्फ शुरुआत है, अभी आगे कई ‘किश्तों’ में दाम और बढ़ेंगे!

और नागरिक याद रखे, बात सिर्फ पेट्रोल पंप पर ₹3 ज्यादा देने की नहीं है। डीजल इस देश के ट्रांसपोर्ट नेटवर्क की रीढ़ है। जब डीजल महंगा होता है, तो सब्जी, फल, दूध, राशन और दवाइयां ढोने वाले ट्रकों का भाड़ा बढ़ता है।

कोल्ड स्टोरेज वाले रेफ्रिजरेटेड व्हीकल्स का खर्च बढ़ेगा, जिसका सीधा असर आपकी रसोई के बजट पर पड़ेगा। शिमला-मनाली घूमने गए सैलानी परेशान हैं कि कमाई तो उतनी ही है, लेकिन खर्च लगातार बढ़ रहा है। उधर, दक्षिण में तमिलनाडु के सीएम सी. जोसेफ विजय ने भी इसे पूरी तरह ‘अस्वीकार्य’ बताते हुए कहा है कि इससे गरीबों की क्रय शक्ति यानी खरीदने की ताकत खत्म हो जाएगी। कैब का किराया बढ़ेगा, बस का टिकट महंगा होगा और फूड डिलीवरी ऐप्स अपनी फीस बढ़ा देंगे।

यानी घूम-फिर कर बात वहीं आती है। सरकारें कहेंगी कि ग्लोबल क्राइसिस है, तेल बचाओ, तपस्या करो। और जनता सोचेगी कि पांच साल में एक बार उंगली पर स्याही लगवा कर क्या उसने सिर्फ महंगाई की ये किश्तें चुकाने का परमिट लिया था?

लेकिन कच्चा तेल दूसरे देशों को बचने वाली प्राइवेट कम्पनियो के तेल निर्यात पर सरकार चुप है। और अपने देश में तेल का संकट। ये कैसी नीति है।