September 29, 2026

दर्द जब उम्र नहीं देखता, तब फिजियोथेरेपी बनती है सहारा

विश्व फिजियोथेरेपी दिवस: दस साल पहले उम्रदराज लोगों में ज्यादा थी जरूरत, अब 20-50 साल के लोग भी पहुंच रहे इलाज के लिए; 60% मरीजों में गर्दन-कमर दर्द

Prabhjot Kaur/Alive News

Faridabad: कभी किताब के ऊपर झुकने से कमर दर्द की शिकायत होती थी, अब मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन के ऊपर घंटों झुकी गर्दन शरीर को दर्द दे रही है। जिंदगी को आसान बनाने वाले मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर अब शरीर के पोश्चर पर भारी पड़ रहे हैं। इसका असर ऐसा है कि गर्दन, कंधे और कमर दर्द अब सिर्फ उम्रदराज लोगों की समस्या नहीं रह गई है। करीब दस साल पहले जहां ऐसे मामले मुख्य रूप से बुजुर्गों में देखने को मिलते थे, वहीं अब 20 से 50 साल की उम्र के लोगों में इनकी संख्या बढ़ रही है। विश्व फिजियोथेरेपी दिवस के मौके पर विशेषज्ञों का कहना है कि बदलती जीवनशैली के साथ फिजियोथेरेपी की भूमिका भी पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।

मैरिंगो एशिया अस्पताल के फिजियोथेरेपी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. कपिल चौहान (पीटी) ने बताया कि करीब 10 साल पहले गर्दन और कमर से जुड़ी यह समस्या मुख्य रूप से बुजुर्गों में ज्यादा देखने को मिलती थी। उस समय फिजियोथेरेपी की जरूरत भी तेजी से कम होती थी। अब 20 से 50 साल की उम्र के लोगों में ऐसे मामले बढ़ रहे हैं। अस्पताल आने वाले मरीजों में करीब 60 प्रतिशत को गर्दन या कमर दर्द की शिकायत रहती है। अस्पताल में रोज ऐसे लोगों को कई तरह की फिजियोथेरेपी दी जा रही है जिसमें मैनुअल थेरेपी, मोबिलाइजेशन, स्ट्रेचिंग, स्ट्रेंथनिंग और पोश्चर करेक्शन ट्रेनिंग शामिल है। मोबाइल और कंप्यूटर का लगातार इस्तेमाल, गलत पोश्चर और लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठे रहना इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इसलिए हर आधे घंटे में करीब एक मिनट का माइक्रो ब्रेक और हर आधे घंटे में करीब पांच मिनट का ब्रेक लेना चाहिए।

एकॉर्ड अस्पताल के चेयरमैन एवं वरिष्ठ ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. युवराज कुमार ने कहा कि अस्पताल की ओपीडी में रोजाना गर्दन, कंधे और कमर दर्द से परेशान करीब 25 से 30 मरीज पहुंच रहे हैं। इनमें अब केवल बुजुर्ग नहीं, बल्कि स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी और ऑफिस में काम करने वाले युवा भी शामिल हैं। उनके अनुसार, लगातार तीन-चार घंटे या उससे अधिक समय तक बिना ब्रेक स्क्रीन देखने से मांसपेशियों पर दबाव बढ़ सकता है। मोबाइल को नीचे रखकर गर्दन झुकाने के बजाय उसे आंखों के करीब ऊंचाई पर रखना चाहिए। लैपटॉप पर काम करते समय स्क्रीन आंखों के स्तर के करीब और पीठ को कुर्सी का उचित सहारा देना चाहिए।

फिजियोथेरेपी में सिर्फ मशीन नहीं, पोश्चर भी सुधारा जा रहा

उन्होंने कहा कि ऐसे मरीजों की जरूरत के अनुसार हीट थेरेपी, जॉइंट मोबिलाइजेशन, सॉफ्ट टिश्यू रिलीज, कोर स्ट्रेंथनिंग और एर्गोनॉमिक ट्रेनिंग दी जाती है। जिससे उन्हे काफी आराम मिलता है। साथ ही शरीर की अंदरूनी मांसपेशियों को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज पर जोर दिया जाता है, क्योंकि यही मांसपेशियां लंबे समय तक सही पोश्चर बनाए रखने में मदद करती हैं।

हर आधे घंटे में बदलें मुद्रा

दोनो विशेषज्ञों के अनुसार काम के दौरान नियमित छोटे ब्रेक लेना, गर्दन-कंधों की हल्की स्ट्रेचिंग करना और रोजाना वॉकिंग व स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज को दिनचर्या में शामिल करना जरूरी है। बच्चों और युवाओं को आउटडोर एक्टिविटी के लिए भी पर्याप्त समय देना चाहिए। दर्द लगातार बना रहे, हाथ-पैर में झनझनाहट या कमजोरी महसूस हो तो विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। सिर्फ दर्द की दवा लेकर गलत पोश्चर में काम करते रहना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।