International/Alive News: अमेरिका और ईरान के बीच 107 दिनों तक चले संघर्ष के बाद आखिरकार शांति समझौता हो गया है। दोनों देशों ने इस समझौते को अपनी-अपनी जीत बताया है और 19 जून को जिनेवा में इस पर आधिकारिक मुहर लगने की उम्मीद है। हालांकि कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने प्रमुख रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाए, इसलिए यह समझौता अमेरिका के लिए पूरी तरह सफल नहीं माना जा सकता।
ट्रंप के लक्ष्य और नतीजे
युद्ध के दौरान ट्रंप ने कई बार ईरान से बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग की थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने ईरान में सत्ता परिवर्तन की भी उम्मीद जताई थी, मगर युद्ध समाप्त होने के बाद भी वहां की मौजूदा व्यवस्था कायम है। नए नेतृत्व को पहले से अधिक कठोर रुख वाला माना जा रहा है।
1. सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ
अमेरिका और इजरायल के हमलों के बावजूद ईरान की राजनीतिक व्यवस्था बनी रही। सरकार का ढांचा नहीं बदला और नया नेतृत्व पहले से अधिक सख्त माना जा रहा है।
2. मिसाइल कार्यक्रम जारी
ट्रंप चाहते थे कि ईरान अपना बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम खत्म करे और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों को समर्थन देना बंद करे। समझौते में ऐसी कोई स्पष्ट शर्त शामिल नहीं दिखाई देती।
3. परमाणु कार्यक्रम पर सवाल बरकरार
युद्ध से पहले दोनों देशों के बीच परमाणु समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी। अमेरिका ने ईरान के संवर्धित यूरेनियम पर नियंत्रण की बात कही थी, लेकिन मौजूदा समझौते में इस मुद्दे पर पूरी स्पष्टता नहीं है।
4. जब्त संपत्तियां वापस मिलने की संभावना
समझौते के तहत ईरान को विदेशों में जब्त की गई कुछ संपत्तियां वापस मिल सकती हैं। इससे ईरान को आर्थिक राहत मिलने की संभावना है।
5. होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा
ट्रंप इसे बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य फिर से खुल गया है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि युद्ध से पहले भी यह मार्ग खुला हुआ था। संघर्ष के दौरान इसे ईरान ने बंद किया था और भविष्य में भी वह ऐसा कदम उठा सकता है।
6. सहयोगी देशों की चिंता बढ़ी
मध्य पूर्व में अमेरिका के सहयोगी देशों के बीच सुरक्षा को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। उनका मानना है कि ईरान अभी भी क्षेत्र में प्रभावशाली स्थिति में है।
7. कूटनीति बेहतर विकल्प थी
कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका शुरुआत से ही बातचीत और कूटनीति का रास्ता अपनाता तो बेहतर और कम खर्चीला समझौता संभव था।
विशेषज्ञों की राय
विदेश मामलों के जानकार रॉबिंद्र नाथ सचदेव के अनुसार, वैश्विक नजरिए से देखा जाए तो यह समझौता अमेरिका और इजरायल की पूर्ण जीत नहीं माना जा सकता। उनका कहना है कि ईरान संघर्ष के बावजूद अपनी स्थिति बनाए रखने में सफल रहा।
वहीं अमेरिकी विदेश विभाग की पूर्व अधिकारी विक्टोरिया टेलर ने कहा कि यह समझौता आगे के टकराव को रोकने के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन कूटनीतिक प्रयासों से इससे बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते थे।
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के विशेषज्ञ जॉन ऑल्टरमैन का मानना है कि ईरान ने यह दिखाया है कि वह भविष्य में भी होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

