New Delhi/Kolkata/Alive News : पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने सबसे बड़े राजनीतिक संकट से जूझती नजर आ रही है। राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रे के इस्तीफे के बाद अब पार्टी के भीतर एक और बड़ा विस्फोट हुआ है। लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया है कि उनके साथ पार्टी के 20 सांसद हैं और उन्होंने लोकसभा स्पीकर से सदन में अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की है।
क्या टूट जाएगी तृणमूल कांग्रेस?
लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 28 सांसद हैं। काकोली घोष दस्तीदार के 20 सांसदों के समर्थन वाले दावे ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। कानूनी जानकारों के मुताबिक, अगर यह दावा सच साबित होता है, तो अलग होने वाला यह गुट दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत होने वाली किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से साफ बच जाएगा। इतना ही नहीं, संख्या बल को देखते हुए इस बागी गुट को चुनाव आयोग द्वारा ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ के रूप में मान्यता मिलने की संभावना भी बढ़ सकती है।
शिवसेना और NCP जैसा इतिहास दोहराने का डर
महाराष्ट्र के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने देश को दिखाया है कि कैसे शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में बगावत के बाद चुनाव आयोग ने बागी गुटों को ही मूल पार्टी और सिंबल सौंप दिया था। टीएमसी के मौजूदा हालात भी कुछ इसी तरह के मोड़ पर खड़े दिखाई दे रहे हैं, हालांकि अभी तक 20 सांसदों की आधिकारिक चिट्ठी की पुष्टि नहीं हो सकी है।
विधायकों के स्तर पर भी गहराया संकट
टीएमसी के लिए मुश्किलें सिर्फ संसद तक सीमित नहीं हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी पार्टी आंतरिक कलह का सामना कर रही है। टीएमसी से निष्कासित ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा स्पीकर पहले ही विपक्ष के नेता के तौर पर मान्यता दे चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ, पार्टी आलाकमान ने वरिष्ठ नेता सोवनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता नियुक्त किया था, लेकिन पार्टी के ही 80 में से 58 विधायकों ने उन्हें अपना नेता मानने से साफ इनकार कर दिया है।
विधायकों और सांसदों के इस दोहरे संकट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। देखना होगा कि टीएमसी इस आंतरिक बगावत से खुद को कैसे बचा पाती है।

