पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय केवल कुछ याचिकाओं का निपटारा भर नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था और उसके कर्मचारियों के बीच विश्वास के रिश्ते की एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। मामला हरियाणा में पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) लागू करने की मांग से जुड़ा है, जिस पर हाई कोर्ट की जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि याचिकाकर्ताओं के दावे पर सक्षम प्राधिकारी छह सप्ताह के भीतर निष्पक्ष सुनवाई करें और एक कारण सहित लिखित आदेश जारी करें। अदालत ने यह भी साफ किया है कि यदि कर्मचारी इस योजना के पात्र पाए जाते हैं, तो उन्हें बिना किसी देरी के तत्काल पुरानी पेंशन का लाभ प्रदान किया जाए।
यह पूरा विवाद वर्ष 2005-06 की भर्ती प्रक्रियाओं और उसके समय-चक्र से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ताओं (लीलो देवी एवं अन्य) ने नई पेंशन योजना (एनपीएस) के तहत शामिल किए जाने की कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी थी। उनका मुख्य तर्क यह था कि जिस पद पर उनका चयन हुआ, उसका पहला विज्ञापन 7 जुलाई 2005 को जारी किया गया था। किसी कारणवश जब वह भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी, तो 20 जुलाई 2006 को नए सिरे से विज्ञापन निकाला गया, लेकिन उसमें पहले आवेदन कर चुके अभ्यर्थियों की पात्रता को सुरक्षित रखा गया था।
गौरतलब है कि हरियाणा सरकार ने 28 अक्टूबर 2005 को एक अधिसूचना जारी कर 1 जनवरी 2006 से नई अंशदायी पेंशन योजना (एनपीएस) लागू की थी। कर्मचारियों ने सरकार के ही 8 मई 2023 के उस कार्यालय ज्ञापन का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि 28 अक्टूबर 2005 या उससे पहले विज्ञापित पदों पर भर्ती होने वाले कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना के पात्र हो सकते हैं। कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने समय रहते इस योजना में शामिल होने के विकल्प का चुनाव किया था। इसके अलावा, उच्चतर शिक्षा विभाग द्वारा जनवरी 2024 में 235 कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का लाभ दिए जाने तथा हाई कोर्ट के पूर्व फैसलों (जैसे ओम प्रकाश बनाम हरियाणा सरकार) के उदाहरण भी सामने मौजूद हैं।
उच्च न्यायालय का यह आदेश प्रशासनिक कार्यशैली के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है। अक्सर देखा जाता है कि जब सरकारी नीतियां बदलती हैं, तो उनके संक्रमण काल (ट्रांजिशन पीरियड) के दौरान भर्ती हुए कर्मचारी नियमों के फेर में फंस जाते हैं। विज्ञापनों में देरी या प्रशासनिक अड़चनों का खामियाजा उन कर्मचारियों को क्यों भुगतना पड़े, जिन्होंने पुरानी नीति के समय ही आवेदन किया था?
अदालत ने मामले के गुण-दोष पर अपनी कोई अंतिम राय दिए बिना गेंद सरकार के पाले में डाल दी है। अब राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इस मामले पर केवल औपचारिकता न निभाए, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण और प्रशासनिक न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर फैसला करे।पुरानी पेंशन योजना किसी भी सरकारी कर्मचारी के लिए केवल एक वित्तीय लाभ नहीं है, बल्कि यह उसके पूरे जीवनकाल की सेवा के बाद बुढ़ापे का सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा कवच है। जब समान परिस्थिति वाले अन्य कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का लाभ मिल चुका है, तो इन याचिकाओं पर भी सकारात्मक और त्वरित निर्णय लिया जाना चाहिए। माननीय न्यायालय से अब मिली छह सप्ताह की यह समयावधि हरियाणा सरकार के लिए कर्मचारियों के प्रति अपनी संवेदनशीलता और पारदर्शी शासन की प्रतिबद्धता को सिद्ध करने का एक बेहतरीन मौका है।

