New Delhi/Alive News: सावन के दौरान दिल्ली-NCR समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में शुक्रवार को हुई तेज बारिश ने लोगों को गर्मी से राहत दी। दिल्ली में हुई भारी बारिश ने बारिश के आंकड़ों में 15 साल का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया। मौसम में इस बदलाव के पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऊपर बना कम दबाव का क्षेत्र और सक्रिय मानसूनी सिस्टम प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।
मौसम विभाग के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऊपर बना कम दबाव का क्षेत्र धीरे-धीरे पश्चिम दिशा की ओर बढ़ रहा है। इसके कारण आने वाले 36 से 48 घंटों में राजस्थान के कई हिस्सों में भारी बारिश हो सकती है। उत्तर प्रदेश में भी गरज-चमक के साथ बारिश की संभावना है, जबकि हरियाणा में कुछ जगहों पर आंधी और तेज बारिश देखने को मिल सकती है।
दिल्ली-NCR में जारी रहेगा बारिश का दौर
कम दबाव वाले सिस्टम के पश्चिम की ओर बढ़ने के साथ बारिश का फोकस धीरे-धीरे दिल्ली से राजस्थान की तरफ शिफ्ट हो सकता है। हालांकि दिल्ली-NCR में बारिश पूरी तरह थमने की संभावना नहीं है। मौसम में उतार-चढ़ाव के बीच कुछ समय बारिश और फिर कुछ समय राहत का दौर जारी रह सकता है।
मानसून ट्रफ भी बना अहम कारण
उत्तर भारत में मानसून की गतिविधियां पहले से सक्रिय हैं। इस दौरान मानसून ट्रफ भी अहम भूमिका निभा रही है। मानसून ट्रफ एक लंबी काल्पनिक पट्टी होती है, जिसके आसपास नमी वाली हवाओं और बादलों की गतिविधि बढ़ जाती है। फिलहाल यह पट्टी उत्तर-पश्चिम भारत के आसपास बनी हुई है, जिससे बारिश के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार हो रही हैं।
राजस्थान में होने वाली बारिश किसानों के लिए राहत लेकर आ सकती है। बारिश से खेतों में मिट्टी की नमी बढ़ेगी, जिससे कई फसलों को फायदा मिलने की उम्मीद है।
बंगाल और ओडिशा में भी बारिश का असर
मौसम विभाग के मुताबिक, 7 अगस्त को दक्षिण-पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक कम दबाव का क्षेत्र बना था। इसके बाद 8 अगस्त को पश्चिम बंगाल और उत्तरी ओडिशा के आसपास भी एक और कम दबाव का क्षेत्र विकसित हुआ। इसके प्रभाव से झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और सिक्किम में आने वाले दिनों में भारी बारिश हो सकती है।
पूर्वी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी 8 से 14 अगस्त के बीच कई इलाकों में बारिश का दौर जारी रहने की संभावना है। दक्षिण भारत में भी मानसून सक्रिय बना हुआ है। तटीय कर्नाटक, केरल, माहे और लक्षद्वीप में 14 अगस्त तक बारिश होने के आसार हैं।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के समुद्री तापमान में अंतर भी मानसून की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। वहीं, अलनीनो की स्थिति कमजोर होने से मानसून के लिए परिस्थितियां अपेक्षाकृत अनुकूल बनी हुई हैं।

