डिजिटल युग में इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म खबरों और सूचनाओं के प्रसार का सबसे सशक्त माध्यम बन चुके हैं। ऐसे में पुलिस या प्रशासन द्वारा किसी मीडिया संस्थान के डिजिटल पेज को अचानक बंद या ब्लॉक कर देना सीधे तौर पर सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार माना जाता है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय इस संदर्भ में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और नज़ीर पेश करने वाला फैसला है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस अपनी मर्जी या मनमाने रवैये से किसी समाचार नेटवर्क का फेसबुक पेज बंद करने का निर्देश नहीं दे सकती।
अदालत का यह रुख कानून के शासन को बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है। सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियम, 2021 के तहत किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को सामग्री हटाने या पेज ब्लॉक करने का निर्देश देने के लिए कम से कम पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) स्तर के विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी की मंज़ूरी अनिवार्य है। यमुनानगर के पुलिस अधीक्षक (SP) द्वारा जारी आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताकर रद्द करते हुए न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया ने यह साफ संदेश दिया है कि नियमों में निर्धारित न्यूनतम रैंक की शर्त को किसी भी प्रशासनिक या राज्य सरकार के आदेश से दरकिनार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे मामले का एक और चिंताजनक पहलू प्रक्रियात्मक पारदर्शिता की अनदेखी था। न्यूज कंपनी के सत्यापित फेसबुक पेज की पहुंच भारत में सीमित कर दी गई, लेकिन कंपनी को न तो पुलिस के निर्देश की प्रति दी गई और न ही कार्रवाई का ठोस आधार बताया गया। अदालत ने बिल्कुल सटीक टिप्पणी की है कि जब तक प्रभावित पक्ष को कार्रवाई के कारणों और लिखित आदेश की प्रति नहीं मिलेगी, तब तक वह प्रभावी ढंग से अपना बचाव कैसे कर सकता है? पारदर्शी प्रक्रिया के बिना शिकायत निवारण तंत्र की पूरी अवधारणा ही निरर्थक हो जाती है।
नि:संदेह, अपराध की रोकथाम, गवाहों को डराने-धमकाने से रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के पास शक्तियां होनी चाहिए। यदि किसी निदेशक या पत्रकार के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज है, तो उस पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन किसी व्यक्ति विशेष पर लगे आरोपों की आड़ में पूरे न्यूज प्लेटफॉर्म की आवाज़ को दबा देना और वह भी स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं को लांघकर—कदापि तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
उच्च न्यायालय द्वारा यमुनानगर एसपी को 24 घंटे के भीतर फेसबुक पेज की मूल स्थिति बहाल करने का निर्देश देना और मेटा को इसका शीघ्र पालन करने को कहना प्रशासनिक अतिरेक पर एक करारा अंकुश है। यह फैसला राज्य के कानून प्रवर्तन तंत्र को यह याद दिलाता है कि जनहित और कानून-व्यवस्था के नाम पर भी तय मानकों और प्रक्रियात्मक अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में प्रेस की आज़ादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा तभी संभव है जब सत्ता और प्रशासन अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का सम्मान करें।
(लेखक अलाईव न्यूज के संपादक हैं)

