September 5, 2026

UN ने बदला दुनिया का नक्शा, भारत पर नहीं पड़ेगा असर; अफ्रीका बड़ा और यूरोप-US छोटे दिखेंगे

UN का नया दुनिया का नक्शा जिसमें अफ्रीका बड़ा और यूरोप व अमेरिका छोटे दिखाई दे रहे हैं

International/Alive News: दुनिया का नक्शा अब पहले से कुछ अलग नजर आ सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को ऐसा ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया है, जिसमें पृथ्वी को दिखाने के लिए ज्यादा सटीक क्षेत्रफल वाले नक्शे को बढ़ावा देने की बात कही गई है। भारत ने भी प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया, जबकि अमेरिका ने इसका विरोध किया।

इस बदलाव से किसी देश की जमीन, सीमा या वास्तविक क्षेत्रफल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सिर्फ नक्शे पर देशों और महाद्वीपों का आकार पहले से कुछ अलग दिखाई देगा। नए तरीके में अफ्रीका का आकार बड़ा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका अपेक्षाकृत छोटे नजर आएंगे।

क्या है नया नक्शा?

अब तक दुनिया में मर्केटर वर्ल्ड मैप का बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता रहा है। इसे 1569 में यूरोपीय मानचित्रकार जेरार्डस मर्केटर ने तैयार किया था। यह नक्शा समुद्री नेविगेशन के लिए काफी उपयोगी है, लेकिन इसमें भूमध्य रेखा से दूर स्थित इलाके वास्तविक आकार से काफी बड़े दिखाई देते हैं।

नए प्रस्ताव में Equal Earth Projection जैसे क्षेत्रफल-सही अनुपात वाले नक्शों को बढ़ावा देने की बात है। इसमें महाद्वीपों और देशों का क्षेत्रफल एक-दूसरे की तुलना में ज्यादा वास्तविक अनुपात में नजर आता है।

भारत पर क्या असर होगा?

भारत की सीमाएं, जमीन और वास्तविक क्षेत्रफल बिल्कुल नहीं बदलेंगे। केवल नक्शे पर उसकी आकृति और दूसरे देशों के मुकाबले उसका आकार थोड़ा अलग दिखाई दे सकता है।

भारत भूमध्य रेखा से बहुत दूर नहीं है, इसलिए मर्केटर नक्शे में उस पर ध्रुवों के पास स्थित देशों जितना बड़ा विकृति प्रभाव नहीं पड़ता। हालांकि नए नक्शे में यूरोप, रूस और कनाडा जैसे उत्तरी क्षेत्रों का आकार कम दिखने के कारण भारत उनकी तुलना में कुछ बड़ा नजर आ सकता है।

भारत के लिए मुख्य बातें:

  • क्षेत्रफल में कोई बदलाव नहीं होगा।
  • अंतरराष्ट्रीय सीमाएं नहीं बदलेंगी।
  • भारत की आकृति थोड़ी अलग दिखाई दे सकती है।
  • दूसरे देशों की तुलना में भारत का आकार अधिक वास्तविक अनुपात में दिख सकता है।
  • अफ्रीका के आकार में बदलाव सबसे ज्यादा स्पष्ट दिखाई देगा।

अमेरिका ने क्यों किया विरोध?

संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला, जबकि 6 देश वोटिंग से दूर रहे। अमेरिका ने इसका विरोध किया और संयुक्त राष्ट्र की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए।

अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने इस पहल की आलोचना करते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया की गंभीर समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने इस बहस को वैचारिक एजेंडे से जोड़ते हुए कहा कि ऐसी प्राथमिकताओं से संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

इसके विपरीत अफ्रीकी संघ ने प्रस्ताव का स्वागत किया। उसका कहना है कि दुनिया को ऐसे नक्शे की जरूरत है जो महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सही तरीके से दिखाए।

मर्केटर नक्शे में क्या समस्या है?

गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर दिखाने में कुछ न कुछ विकृति होना तय है। मर्केटर प्रोजेक्शन में जैसे-जैसे कोई क्षेत्र भूमध्य रेखा से दूर जाता है, वह नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है।

ग्रीनलैंड इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड दक्षिण अमेरिका के लगभग बराबर दिखाई देता है, जबकि वास्तविकता में दक्षिण अमेरिका का क्षेत्रफल उससे कई गुना ज्यादा है।

अफ्रीका के मामले में भी अंतर काफी बड़ा है। अफ्रीका का वास्तविक क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है, लेकिन पुराने नक्शे में उसका आकार उसकी वास्तविक विशालता को पूरी तरह नहीं दिखाता।

अफ्रीकी देश नए नक्शे के पक्ष में क्यों हैं?

अफ्रीकी देशों का कहना है कि नक्शा केवल भूगोल समझने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह लोगों की सोच को भी प्रभावित करता है। लंबे समय तक अफ्रीका को वास्तविक आकार से छोटा देखने से उसके क्षेत्रफल और वैश्विक महत्व को लेकर गलत धारणा बन सकती है।

प्रस्ताव में लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों का भी उल्लेख किया गया है। समर्थकों का तर्क है कि ज्यादा सटीक नक्शे से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की वास्तविक भौगोलिक स्थिति को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।

क्या मर्केटर नक्शा पूरी तरह खत्म हो जाएगा?

ऐसा नहीं है। संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब है कि स्कूल, किताबों के प्रकाशक, कंपनियां या सरकारें मर्केटर नक्शे को इस्तेमाल करना तुरंत बंद करने के लिए बाध्य नहीं हैं।

मर्केटर प्रोजेक्शन का इस्तेमाल समुद्री नेविगेशन जैसे क्षेत्रों में आगे भी किया जा सकता है, क्योंकि इसकी खासियत दिशाओं को सही तरीके से दिखाना है। नए नक्शे का उद्देश्य मुख्य रूप से देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल को ज्यादा सही अनुपात में दिखाना है।

न्यूजीलैंड का नक्शे से पुराना मजाक

न्यूजीलैंड भी लंबे समय से दुनिया के नक्शों में अपनी स्थिति को लेकर मजाक करता रहा है। कई विश्व मानचित्रों में वह किनारे पर होने के कारण छोटा दिखाई देता है या कभी-कभी नक्शे में नजर ही नहीं आता।

2018 में न्यूजीलैंड के एक पर्यटन अभियान में तत्कालीन प्रधानमंत्री जैसिंडा आर्डर्न भी इस मजाक का हिस्सा बनी थीं। नए प्रोजेक्शन के कुछ रूपों में ओशिनिया को ज्यादा प्रमुख स्थान मिलने से ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों की स्थिति अधिक स्पष्ट नजर आ सकती है।

UN का प्रस्ताव कितना प्रभावी होगा?

यह प्रस्ताव बाध्यकारी कानून नहीं है, इसलिए इससे दुनिया के सभी नक्शे तुरंत नहीं बदलेंगे। हालांकि इससे शिक्षा, प्रकाशन और डिजिटल मैपिंग में क्षेत्रफल को ज्यादा सही तरीके से दिखाने वाले प्रोजेक्शन के इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है।

इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि लोग दुनिया के देशों और महाद्वीपों के वास्तविक आकार को पहले की तुलना में ज्यादा सही अनुपात में देख सकेंगे।