September 16, 2026

सूरजकुंड मेले में ‘लुप्त होती बिन कला’ ने बांधा समा, देसी-विदेशी कलाकार भी थिरकने को हुए मजबूर

Faridabad/Alive News : फरीदाबाद स्थित 39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेले में लुप्त होती पारंपरिक लोक बीन कला के शानदार प्रदर्शन ने देशी ही नहीं बल्कि विदेशी कलाकारों और पर्यटकों को भी झूमने पर मजबूर कर दिया। इस लोक कला के माध्यम से भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक मेले में पहुंचे।

हरियाणा के करनाल निवासी विनोद नाथ सपेरा ने बताया कि वह कई वर्षों से बीन बजा रहे हैं। पहले वह जगह-जगह जाकर सांप और सपेरे का खेल दिखाया करते थे। वह हर साल सूरजकुंड मेले में आते हैं और बीन कला के माध्यम से अपनी संस्कृति को पर्यटकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह विदेशी कलाकार भारत आकर अपनी संस्कृति का प्रदर्शन करते हैं, उसी तरह सरकार को भी भारतीय लोक कलाओं और संस्कृति को विदेशों में मंच देना चाहिए, ताकि दुनिया भारत की सांस्कृतिक धरोहर से परिचित हो सके।

विनय नाथ ने बताया कि सांप और सपेरे का संबंध सदियों पुराना है, जो भगवान शिव और गुरु गोरखनाथ से जुड़ा माना जाता है। हालांकि, सरकार द्वारा सांप रखने पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद सपेरा समुदाय के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। उन्होंने कहा कि प्रतिबंध तो लगा दिया गया, लेकिन इसके बदले कोई वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध नहीं कराया गया। सूरजकुंड मेला साल में एक बार आता है और इस बार उन्हें सिर्फ तीन दिन ही अपनी कला प्रस्तुत करने के लिए मिले, जबकि पहले 14-15 दिन तक का समय मिलता था, जिससे वह काफी निराशा है। मेले के बाद उन्हें शादियों या अन्य छोटे कार्यक्रमों में ही काम मिल पाता है।

राजेंद्र नाथ ने भी बताया कि सांप रखने पर प्रतिबंध की सूचना उन्हें अचानक दी गई थी। अब मेले के बाद उन्हें कहीं-न-कहीं काम ढूंढकर अपने परिवार का पालन-पोषण करना पड़ता है।

क्या है बीन कला

बीन एक पारंपरिक लोक संगीत कला है, जिसमें लौकी (कद्दू), लकड़ी और मोम से बने वाद्ययंत्र ‘बीन’ का उपयोग किया जाता है। यह कला मुख्य रूप से सपेरा समुदाय द्वारा सांपों को रिझाने और मनोरंजक प्रदर्शन के लिए की जाती रही है। कभी ग्रामीण भारत में बेहद लोकप्रिय रही यह लोक कला आज विलुप्त होने की कगार पर है।