October 20, 2021

ओजन परत में छेद होने से परेशान हैं पर्यावरणविद

राजेन्द्र सिंह

खेती में पानी से हरियाली, जवानी में खुशहाली आती है, यही जलवायु परिवर्तन, अनुकूलन और उन्मूलन है। व्यवस्था में छेद होने से पहले हमारे में छुद्रता आती है और यह छुद्रता यदि वैचारिक हो तो इसका अर्थ यह है कि, हमारे पतन की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। यह सुलगती सच्चाई है औैर इस सच्चाई का सबब यह है कि, आज राजनीति से लेकर समाज, अर्थव्यवस्था और हमारा पर्यावरण, सब कुछ छलनी हो चला है। हमने ओजोन की छतरी में भी छेद कर डाला है, जो सूरज की खतरनाक किरणों से हमें अब तब बचाती रही है। वह अब लाल गर्मी बनकर धरती से बादलों को रूठाने लगी है। परिणाम वेमौसम वर्षा, बादल फटना,बाढ़-सुखाड़ की मार किसानी-जवानी-पानी पर पड़ने लगी है।

खेती, किसानी, पानी, जवानी कम्पनी राज के आधीन हो रही है। पानी से निर्मित संसार अब पानी का नहीं रहा है। अब पानी पंचमहाभूतों को मिलाने और उसमें प्राण संचार करने वाला पदार्थ नहीं रहा है। व्यापार की वस्तु बन गया है। हमारे संविधान के अनुसार जीवन को व्यापार की वस्तु नहीं बना सकते है। पूरा भारत ‘जल ही जीवन है’ बोलता है। संविधान से चलने वाली सरकार संविधान के विरुद्ध जीवन जल को व्यापार की वस्तु नहीं बन सकती है। इसीलिए इसके व्यापारीकरण एवं निजीकरण का कानून नहीं बना है। यह एक समझौता होता है।

यह समझौता सरकार और कम्पनी के बीच जल व्यापार का हो गया है। बोतल बंद करके जल व्यापार गहरा-भूजल-पाताल से जल निकालकर कंपनियों को बेचने का अधिकार दे दिया है। नदी को प्रवाह विहीन बनाने का काम बताकर कानून चल रहा है। खेती में लगे किसानी को भी लूटने हेतु कानून आजादी से पहले व बाद में संविधान ने शोषण मुक्ति के रास्ते खोले थे। पहले सभी कानून जब तक संविधान के प्रकाश में बने तब तक किसानों को शोषण से मुक्ति का रास्ता मिला था। अब संविधान के प्रकाश की अनदेखी करके किसान की लूट के कानून बन गये, अब कोई एक व्यक्ति या कंपनी पूरे भारत के संम्पूर्ण उत्पादन को खरीद कर संग्रह कर सकता है। ऐसे ही कोई एक व्यक्ति या कंपनी पूरी नदी खरीद सकता है।

शिवनाथ के बाद आजकल बहुत सी नदियों का जल कंपनियाँ उढ़ाकर बेंच रही है। ये समझौते हमारी सरकार और कम्पनियों के बीच के समझौते है। कंपनियों के लाभ और लोक हानि के ये समझौते संविधान के विरुद्ध है।
संविधान विरोधी सरकार लोकतांत्रिक नहीं हो सकती, लोकतांत्रिक सरकार के झूंठ बोलकर लोक को डराने की आवश्यकता नहीं होती है। वह तो लोक विश्वास पाकर बनती है। लोकहित में ही लोक जीवन, जीविका, जमीर का ख्याल रखकर लोकहित में कानून बनाती है। समझौते नहीं संविधानिक व्यवस्था बनाती है। खेती, किसानी, पानी, जवानी की रोजगारी और कमाई का संकट भारत में नए कंपनीराज के कारण जन्मा है। इस समय सरकार लोकहित नहीं, कंपनीहित में ही सभी निर्णय कर रही है। सरकार निर्णय नहीं, कंपनी हित के निर्णय ही कर रहे है। छोटी कंपनियाँ नहीं, बड़ी कम्पनियों को और बड़ा बनाने का काम सरकार कर रही है।

कोविड़ काल में केवल चंद कम्पनियों ने समुद्र जल, तट, पोट, नदियों का पानी मनमर्जी तरीके से इस्तमाल करके मालामाल बन रही है। खेती का पानी कंपनियाँ ले रही है। फसले फेल हो रही है। किसान की आय तो छोड़ो, जीवन चलाना मुश्किल हो रहा है। जीविका तो जल से ही बनती है, जल पर कंपनी अधिकार, जीवन-जीविका लाचार, जमीर तो अब बचा ही नहीं है।
यह करार खेती समझौता तो बहुत भयानक है। सभी कुछ ,खेती, फसलें आदि का फैसला ही कंपनियाँ करेंगी। पानी, किसानी, जवानी सभी कुछ एक ही कंपनी के अधिकार में आ जायेगी। यह व्यवस्था आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन खेती क्रांति के नाम पर किया है। आज कृषि के तीनों कानून दिखावे के नाम पर हुए समझौते है। इससे दुगनी आय किसान की तो नहीं होगी, लेकिन कंपनी की सौगुनी हो जायेगी। कंपनी ने व्यापार से राज कायम करने का रास्ता खेती व्यापार द्वारा खोजा है। जल और खेती दोनों एक-दूसरे से जुड़े है। दोनों पर अब एक साथ भारतीय कंपनियों की नजर गढ़ गई है। जो काम ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं करपायी थी, वह काम अब यह भारतीय कंपनियाँ करने की तैयारी करके बैठी है। अंग्रेज भारत के पानी को किसी कंपनी को नहीं दे सकता था, अब भारत सरकार दे रही है।

अंग्रेजी राज्य में खेती संस्कृति थी, लोकतांत्रिक भारत के लोक को तंत्र(सरकार) ने कंपनियों से समझौता करके उनके खेती कानून भारतीय किसानों पर पूर्ण रूप से थोपना शुरू कर दिया है। शुरु में ही करार करके टमाटर, मिर्च, गोभी, सेव कंपनियाँ नहीं खरीद रही है। कम भाव होने से किसान सड़कों पर डाल कर आ रहा है। किसान की ऐसी बेकारी पहले कभी नहीं हुई है। जैसे अब 2021 में हो रही है।

इस वर्ष अच्छी वर्षा हुई है, लेकिन जल संरक्षण नहीं, जल निजीकरण हर घर में नल और नल में जल नहीं है। गाँव-गाँव में टंकी बन रही है। टंकी में जल भरने हेतु पानी उपलब्ध नहीं है। कंपनियाँ पानी की मालिक है। अपने मनमाने भाव से अब बेचेगी कम्पनियों ने खेती किसानी, पानी, जवानी, को अपने आधीन करने की सम्पूर्ण तैयारी करली है। हमने भी इस सत्य को समाज को समझाने हेतु जल साक्षरता यात्रा शुरु कर दी है। यह सर्म्पण भारत में किसानी, जवानी, पानी के भावी संकट पर जल,जंगल, जमीन संवाद-किसान स्वराज यात्रा के नाम से चलेगी।

अघोषित आपातकाल मुक्ति की चेतना बढ़ाना, जल, जंगल, जमीन संवाद करना -किसान स्वराज यात्रा का लक्ष्य है। यह यात्रा 2 अक्टूबर 2021 को सेवाग्राम, साबरमती आश्रमों से तथा देश भर में 100 से अधिक स्थानों पर शुरू होगी। किसान आंदोलन, जल, जंगल जमीन के देशभर में चल रहे सभी आंदोलन अपने मतभेदों को भूलाकर पूरे देश के जन आंदोलनों को एक करके जल जंगल, जमीन, खेती, किसानी, पानी, जवानी पर आये संकट से बचाने की चेतना यात्रा है।

बापू के स्वराज आंदोलन की तर्ज पर यह एक अहिंसामय सत्याग्रह है। अब धीरे-धीरे पूरे देश में लोग संगठित होकर तानाशाही व अघोषित आपातकाल के विरुद्ध वातावरण निर्माण करने हेतु यह संवाद-किसान स्वराज चेतना यात्रा आयोजित कर रहे है। दिल्ली की सीमाओं पर शांतिमय किसान सिपाही संघर्षशील है। उन्हें नैतिक बल देने हेतु यह यात्रा है। देशभर में तीन कृषि कानून रदद् कराने व एम.एस.पी. खरीद की गारंटी का कानून बनाने के सवाल पर सभी किसान, मजदूर, उपभोक्ता और उत्पादनकर्ता किसान एक होकर अब देशभर के लोग अहिंसामय सत्याग्रह की तैयारी में जुटाने हेतु इस यात्रा की जरूरत है।

अभी समय है, जब हम किसान की किसानी-पानी, भारत की जवानी बचाने के लिए सभी एक साथ खड़े हो। हम जलवायु परिवर्तन, अनुकूलन करके इस समस्या का उन्मूलन कर सकेंगे। किसान के उत्पादन को सुरक्षा और ठीक दाम दिला सकेंगे। भारत के नीर,नारी और नदी को भी बाजार की लूट से बचाने की लड़ाई जीत सकेंगे। आप सभी साथी अपने-अपने क्षेत्रों में जल, जंगल, जमीन संवाद द्वारा किसान स्वराज यात्रा करके किसान आंदोलन की मदद करें। देश में शांति, सद्भावना कायम रखकर विजय प्राप्त करें।

(लेखक जल और पर्यावरण के क्षेत्र में अवॉर्डी है)

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