June 12, 2026

सूर्य उपासना और आत्म-शुद्धि का पर्व: आस्था और एकता का प्रतीक छठ पूजा

Faridabad/Alive News: सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाएगा। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई इलाकों के साथ-साथ अब देश के कई बड़े शहरों में भी इस पर्व का उत्साह देखने को मिल रहा है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है, जिसमें भक्त संतान की सुख-समृद्धि और परिवार की भलाई के लिए 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं।

इस वर्ष छठ पर्व की शुरुआत 25 अक्टूबर को नहाय-खाय  से होगी, 26 अक्टूबर को खरना के बाद व्रती निर्जला उपवास रखेंगी। 27 अक्टूबर को वृत्तियां नदी-तालाब और घाटों पर डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगे, जबकि 28 अक्टूबर की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर व्रत का समापन करेंगी।

छठ पूजा का महत्व
छठ पूजा को आत्मा की शुद्धि, परिवार की खुशहाली और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी पुजारी की आवश्यकता नहीं होती व्रती स्वयं पूजा करती हैं और पूरी प्रक्रिया पवित्रता, संयम और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

ये होता है पूजा की थाली में प्रसाद
छठ पूजा की थाली को बेहद पवित्र माना जाता है। इसमें गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बना ठेकुआ प्रमुख प्रसाद होता है। इसके साथ केला, नारियल, अमरूद, गन्ना, नींबू, शकरकंद और मौसमी फल रखे जाते हैं। पूजा स्थल पर मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं और घाटों पर भक्ति गीतों की गूंज माहौल को दिव्यता से भर देती है।

छठ पूजा व्रत की विधि
पहला दिन – नहाय-खाय : सुबह स्नान के बाद घर की सफाई की जाती है। व्रती पूरे दिन व्रत रखकर शाम को एक बार सात्विक भोजन करता है, जिसमें लौकी-भात और चने की दाल होती है।

दूसरा दिन – खरना : इस दिन व्रती निर्जला व्रत रखता है। शाम को सूरज डूबने के बाद गुड़ की खीर, रोटी और केले का प्रसाद बनाकर पूजा की जाती है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद अगला निर्जला व्रत शुरू होता है।

तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य : व्रती पूरे दिन बिना जल और अन्न के उपवास रखता है। शाम को नदी, तालाब या घाट पर जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस दौरान ठेकुआ, नारियल, फल और दीपक चढ़ाए जाते हैं।

चौथा दिन – उषा अर्घ्य : सुबह सूर्योदय से पहले घाट पर जाकर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद छठी मैया का आशीर्वाद लेकर व्रत का समापन किया जाता है।

पर्व का संदेश
छठ पूजा केवल सूर्य की उपासना नहीं, बल्कि यह मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन का संदेश देती है। जब डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तो यह जीवन के हर उतार-चढ़ाव में धैर्य और आस्था बनाए रखने की प्रेरणा देता है। यह पर्व सच में भारतीय संस्कृति की उस गहराई को दर्शाता है, जहां भक्ति के साथ-साथ पर्यावरण, परिवार और समाज के प्रति प्रेम झलकता है।

क्या कहना है लोगों का
छठ पूजा हमारे लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि हमारी पहचान है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। जब पूरा परिवार घाट पर एकत्रित होता है, तो एक एकता का भाव जागता है। यह त्यौहार हमें सिखाता है कि प्रकृति और सूर्य देव के प्रति श्रद्धा ही जीवन की असली शक्ति है।”
-गुडिया देवी, स्थानीय निवासी रोशन नगर

“मैं पहले सोचती थी कि छठ पूजा सिर्फ ग्रामीण इलाकों में मनाई जाती है, लेकिन अब दिल्ली जैसे शहरों में भी इसका रंग देखने को मिलता है। यह देखकर अच्छा लगता है कि युवा भी अपने रूट्स से जुड़े रहते हैं। हालांकि, मुझे लगता है कि हमें घाटों की सफाई और प्लास्टिक के इस्तेमाल पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।”
-एकता, स्थानीय निवासी डबुआ कॉलोनी

“इस व्रत में सबसे बड़ी बात है संकल्प। जब एक स्त्री बिना खाए-पिए पूरे दिन अपने परिवार की भलाई के लिए प्रार्थना करती है, तो वह सिर्फ पूजा नहीं कर रही होती वह अपनी आत्मा को ईश्वर से जोड़ रही होती है।
– प्रेमा, स्थानीय निवासी संजय कॉलोनी

“मेरे लिए छठ पूजा किसी धर्म से परे एक ध्यान की अवस्था है। जब सूर्य की किरणें जल पर पड़ती हैं और भक्ति गीत गूंजते हैं, तब मन पूरी तरह स्थिर हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे आत्मा और परमात्मा एक हो गए हों।”

-कांति देवी, स्थानीय निवासी डबुआ कॉलोनी