Prabhjot Kaur/ Alive News
Faridabad: रात के 11 बज चुके हैं। घर के बाकी लोग सो चुके हैं, लेकिन बच्चे के कमरे की लाइट अभी भी जल रही है। हाथ में मोबाइल है और स्क्रीन लगातार बदल रही है। कभी सोशल मीडिया की पोस्ट, कभी रील और कभी किसी दोस्त की ऑनलाइन गतिविधि। बाहर से देखने पर यह सिर्फ मोबाइल चलाने की आदत लगती है, लेकिन कई बार इसी स्क्रीन के पीछे बच्चा अकेलेपन, तनाव और भावनात्मक दबाव से जूझ रहा होता है। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर विशेषज्ञों ने बताया कि स्क्रीन वास्तविक रिश्तों की जगह लेने लगे तो यह मानसिक परेशानी को बढ़ा सकती है।
एकॉर्ड अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग के डॉ. रोहित गुप्ता बताते हैं कि किशोरों में सोशल मीडिया पर दूसरों की जिंदगी से अपनी तुलना, ऑनलाइन प्रतिक्रिया न मिलना, रिश्तों से जुड़ी परेशानी और लगातार स्क्रीन पर बने रहने की आदत तनाव बढ़ा सकती है। खासकर 12 से 19 वर्ष की उम्र भावनात्मक रूप से संवेदनशील होती है। इस दौरान पढ़ाई का दबाव, आत्मसम्मान में कमी और अकेलापन जैसी परेशानियां सोशल मीडिया के लगातार इस्तेमाल से और गहरी हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि समस्या मोबाइल से ज्यादा उसके इस्तेमाल के तरीके में है। यदि बच्चा मोबाइल को वास्तविक सामाजिक रिश्तों का विकल्प बना ले और धीरे-धीरे परिवार, दोस्तों और सामान्य गतिविधियों से कटने लगे तो यह चिंता का विषय है।
मरेंगो एशिया अस्पताल की न्यूरोलॉजी विभाग निदेशक डॉ. सुषमा शर्मा के अनुसार, किशोर और युवा भावनात्मक रूप से ज्यादा संवेदनशील होते हैं। देर रात तक मोबाइल चलाने से नींद पूरी नहीं होती और इसका असर मानसिक स्थिति पर पड़ सकता है। उनका कहना है कि परिवार को बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों को समय रहते पहचानना चाहिए।
इन बदलावों को नजरअंदाज न करें
उन्होंने कहा कि अभिभावकों को केवल स्क्रीन टाइम गिनने के बजाय बच्चे के व्यवहार पर नजर रखने की जरूरत है। अचानक दोस्तों और परिवार से दूरी बनाना, नींद या भूख में बदलाव, पहले पसंद आने वाली गतिविधियों से रुचि खत्म होना, लगातार चिड़चिड़ापन या निराशा की बातें करना चेतावनी के संकेत हो सकते हैं। ऐसे समय में बच्चे को डांटकर मोबाइल छीनने के बजाय उससे बातचीत की जाए। उसे अपनी बात रखने का मौका दिया जाए और परिवार के साथ समय बढ़ाया जाए। यदि बच्चा खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या जैसे विचारों की बात करे, तो उसे अकेला न छोड़ें और तुरंत मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लें।

