July 7, 2026

आरएच आइसोइम्यूनाइजेशन से जूझ रही रेशमा की हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी सफल, तीन महीने का बच्चा अब पूरी तरह स्वस्थ

Noida/Alive News: दो बार गर्भावस्था खोने के दर्द से गुजर चुकी दिल्ली के मयूर विहार की 29 वर्षीय रेशमा के लिए तीसरी गर्भावस्था भी बेहद चुनौतीपूर्ण थी। गर्भ में पल रहे शिशु में 19वें सप्ताह में जानलेवा फीटल एनीमिया का पता चला। ऐसे में नोएडा स्थित  कैलाश हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने गर्भाशय के अंदर ही पांच बार इंट्रायूटेराइन ब्लड ट्रांसफ्यूजन कर बच्चे की जान बचाई। समय पर इलाज की बदौलत 34वें सप्ताह में बच्चे का सुरक्षित जन्म हुआ। अब तीन महीने का यह बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है और नियमित चिकित्सकीय निगरानी में सामान्य रूप से बढ़ रहा है।
डॉक्टरों के अनुसार रेशमा का ब्लड ग्रुप आरएच नेगेटिव जबकि पति का आरएच पॉजिटिव है। पहली डिलीवरी के बाद महिला को समय पर एंटी-डी इम्यूनोग्लोबुलिन नहीं दिया गया था। इसके कारण शरीर में बनी एंटीबॉडी अगली गर्भावस्था में भ्रूण की लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला करने लगीं, जिससे बच्चे में गंभीर एनीमिया हो गया।
कैलाश हॉस्पिटल की फीटल मेडिसिन एवं मेडिकल जेनेटिक्स की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. नेहा गुप्ता ने बताया कि गर्भावस्था के 19वें सप्ताह में भ्रूण में गंभीर एनीमिया मिलने के बाद 29 दिसंबर 2025 को पहला इंट्रायूटेराइन ब्लड ट्रांसफ्यूजन किया गया। इसके बाद तय अंतराल पर कुल पांच ट्रांसफ्यूजन किए गए। इस प्रक्रिया में गर्भनाल के जरिए भ्रूण को ओ नेगेटिव रक्त चढ़ाया जाता है, जिससे गर्भावस्था सुरक्षित रखने और बच्चे की जान बचाने में मदद मिलती है।
रेशमा ने कहा कि दो बच्चों को खोने के बाद तीसरी गर्भावस्था को लेकर पूरा परिवार डरा हुआ था, लेकिन डॉक्टरों ने हर चरण में उनका हौसला बढ़ाया। उन्होंने कहा कि आज अपने बेटे को स्वस्थ देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई चमत्कार हुआ हो।
डॉ. नेहा गुप्ता ने कहा कि आरएच नेगेटिव महिलाओं को प्रसव, गर्भपात या गर्भावस्था से जुड़ी प्रक्रियाओं के बाद समय पर एंटी-डी इम्यूनोग्लोबुलिन दिया जाए तो आरएच आइसोइम्यूनाइजेशन जैसी गंभीर स्थिति से काफी हद तक बचाव संभव है। हाई-रिस्क गर्भावस्था में समय पर जांच, विशेषज्ञों की निगरानी और आधुनिक उपचार से मां और बच्चे दोनों की जान सुरक्षित रखी जा सकती है।