New Delhi/Alive News: तमिलनाडु सरकार ने गोहत्या पर रोक लगाने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। राज्य सरकार ने सर्वोच्च अदालत में विशेष अनुमति याचिका (स्पेशल लीव पिटिशन) दायर कर 27 मई को दिए गए मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने की मांग की है।
मद्रास हाईकोर्ट ने अपने आदेश में वर्ष 1976 के सरकारी आदेश को लागू करते हुए पूरे तमिलनाडु में गाय और बछड़ों के वध पर रोक सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।
क्यों दिया गया था हाईकोर्ट का आदेश?
मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि वर्ष 1976 का सरकारी आदेश दूध उत्पादन बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से जारी किया गया था। इसी आदेश के आधार पर अदालत ने राज्य सरकार को गोहत्या पर प्रभावी रोक लगाने के निर्देश दिए थे।
इस मामले की मूल याचिका हिंदू मक्कल काची के युवा विंग के सचिव के. सूर्या उर्फ के. सूर्या प्रशांत ने दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में उन्हें प्रतिवादी बनाया गया है। इसके अलावा पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) सहित अन्य अधिकारियों को भी पक्षकार बनाया गया है।
के. सूर्या की ओर से अधिवक्ता पी. वी. योगेश्वरन ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अदालत कोई भी आदेश पारित करने से पहले उनका पक्ष भी सुने।
27 मई को न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायण की खंडपीठ ने राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया था कि बकरीद की पूर्व संध्या और उसके बाद भी किसी भी दिन राज्य में गाय या बछड़े का वध न होने दिया जाए।
संविधान के अनुच्छेद 48 का दिया गया हवाला
अपने फैसले में न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन ने संविधान के अनुच्छेद 48 का उल्लेख करते हुए कहा था कि राज्य का दायित्व है कि वह गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू और भार ढोने वाले पशुओं के संरक्षण और उनके वध पर रोक लगाने के लिए आवश्यक कदम उठाए।
उन्होंने यह भी कहा था कि संविधान सभा की बहसों में गाय को भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण एवं पूजनीय पशु बताया गया था।

