लेखक- प्रभजोत कौर
आज भारत का जन स्वास्थ्य आपातकाल की चपेट में है। देश में 10 करोड़ से अधिक मधुमेह रोगी हैं, हृदय रोग और कैंसर की दरें लगातार बढ़ रही हैं, और बचपन का मोटापा नए खतरे के स्तर पर पहुंच चुका है। यह संकट किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि उस व्यवस्थागत गिरावट का परिणाम है जो हमारे खाद्य और औषधि सुरक्षा ढांचे में गहराई तक प्रवेश कर चुकी है।
भ्रष्टाचार और लापरवाही का जाल
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई), जिसे देश की खाद्य सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए, उसका हाल स्वयं एक चेतावनी है। मई 2024 में सीबीआई ने मुंबई स्थित एफएसएसएआई के सहायक निदेशक को रिश्वत लेते गिरफ्तार किया छापेमारी में करोड़ों की अवैध संपत्ति मिली। यही नहीं, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 2023 की रिपोर्ट में सामने आया कि देशभर में लिए गए करीब एक-तिहाई खाद्य नमूने सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरे, लेकिन केवल कुछ ही पर कार्रवाई हुई। आरटीआई खुलासों ने भी एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है। 2018 से 2022 के बीच 35 लाख से अधिक खाद्य लाइसेंस जारी हुए, पर केवल गिने-चुने रद्द किए गए। इसका सीधा अर्थ है कि जो भी बाजार में है, वह लगभग बिना डर के है।
कॉर्पोरेट जगत की भूमिका भी उतनी ही सवालों के घेरे में है। जैसे की नेस्ले का सेरेलैक भारत में अतिरिक्त चीनी के साथ बेचा जाता है, जबकि यूरोप में यही उत्पाद बिना किसी अतिरिक्त चीनी के मिलता है। एमडीएच और एवरेस्ट मसालों में कैंसरकारी तत्व पाए जाने पर सिंगापुर और हांगकांग ने कई बैचों पर प्रतिबंध लगाया। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने भी शहद, दूध और पनीर में मिलावट के साक्ष्य उजागर किए हैं। यह केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा नहीं, नागरिकों के स्वास्थ्य से सीधा खिलवाड़ है। अब कफ सिरप कांड हाल ही में देश के सामने आया है। कफ सिरप हादसे ने इस तंत्र की नाकामी को एक बार फिर से उजागर कर दिया। इस सिरप के कारण मध्यप्रदेश और राजस्थान में दर्जनों बच्चों की मौत हो गयी जिसमें डाइइथाइलीन ग्लाइकोल जैसे जहरीले तत्व पाए गए। भारत निर्मित सर्पों ने पहले भी कई देशों में जान ले चुके उधर, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस विषय पर चिंता जताते कहा कि जब औषधि और खाद्य सुरक्षा, दोनों ही निगरानी प्रणालियां जवाबदेह नहीं रहीं, तो नतीजा सिर्फ़ मौतें ही हैं।
व्यवस्था के नाम पर देरी
भारत में इस से संबंधित मंत्रालय और विभाग है l वो इतने गेर जिम्मेदार है कि भारत में ट्रांस फैट को खत्म करने के लिए WHO ने समय सीमा सन 2023 तय की थी, लेकिन हमारे देश में यह नियम 2024 में जाकर पूरी तरह लागू हुआ। इसी तरह पैक के आगे चेतावनी लेबल (एफओपीएल) नीति, जो उपभोक्ताओं को अस्वास्थ्यकर उत्पादों की पहचान करने में मदद करती, वह भी पांच वर्षों से लंबित है।
जवाबदेही की मांग
यह अब महज़ नीतिगत बहस नहीं रही। यह सवाल जीवन और मृत्यु का है। नागरिकों को यह अधिकार है कि उन्हें बताया जाए कि वे क्या खा रहे हैं, क्या पी रहे हैं। अब जरूरी है एफएसएसएआई में उच्च-स्तरीय स्वतंत्र जांच भ्रष्टाचार और नियामक शिथिलता पर पारदर्शी रिपोर्ट जारी हो। कफ सिरप जैसे मामलों में त्वरित ट्रेसिंग और रिकॉल सिस्टम हो ताकि जहरीली दवाएं बाजार में न रहें और न आ सके। एफओपीएल नीति का तत्काल क्रियान्वयन उपभोक्ता को सच जानने का अधिकार मिले। कॉर्पोरेट जवाबदेही हो और दोहरे मानक अपनाने वाली कंपनियों पर सख्त दंड हो।
भारत को अब तय करना होगा क्या हम एक ऐसे देश में जीना चाहते हैं जहां हर निवाला और हर दवा संभावित जहर हो। जन स्वास्थ्य की रक्षा का वादा करने वाले संस्थानों को अब केवल कानून नहीं, विश्वास भी वापस कमाना होगा। क्योंकि जब व्यवस्था ही ज़हर बन जाए, तो मौन रहना भी अपराध होता है।
अब सिर्फ भारत के नागरिकों को ही नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य और जन खाद्य के लिए देश को तो जागरूक होना ही होगा इस से पहले स्वास्थ्य विभाग खाद्य विभाग के मंत्रालयों को भी उनके अंदर फैले भ्रष्टाचार को समाप्त करना होगा तभी जाकर आपातकाल स्थिति से बचा जा सकता है l
(लेखक बीजेएमसी की फाइनल ईयर की छात्रा है)

