March 7, 2026

क्यों की जाती है गोवर्धन पूजा, 56 तरह के भोग लगाने के पीछे धार्मिक मान्यता जानिए?

Faridabad/Alive News: अन्नकूट व गोवर्धन पूजा आज यानी 22 अक्टूबर, बुधवार को है। इस दिन गौ वंश की पूजा की जाती है। इस दिन कई प्रकार के नए अन्न से अन्नकूट बनाकर (गोवर्धन पर्वत) पूजा होती है। इसमें खास तौर पर कामधेनु रूपी गाय की विशेष तौर पर पूजा होती है। शास्त्रों में भी गायों को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है, जो सुख और समृद्धि प्रदान करती हैं। इस दिन गोवर्धन पूजा प्राकृतिक विपत्तियों से बचाव के लिए की जाती है। इस दिन गौ क्रीड़ा के साथ उत्सव का भी पारंपरिक प्रचलन है। जानें गोवर्धन पूजा का त्योहार क्यों मनाया जाता है और गोवर्धन पूजा करने से क्या फल मिलता है।

गोवर्धन पूजा का त्योहार क्यों मनाया जाता है

पंडित कृष्णा पाण्डेय ने बताया कि पंचांग के अनुसार कार्तिक शुक्ल प्रदिपदा तिथि इस बार 21 अक्टूबर को शाम 4 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 22 अक्टूबर की रात 7 बजकर 10 मिनट तक रहेगा। इसलिए उदयातिथि के अनुसार गोवर्धन पूजा बुधवार को की जाएगी। शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान कृष्ण ने इस दिन इंद्र के अतिवृष्टि कराने के कारण ब्रजवासियों को बचाने के लिए पूरा गोवर्धन पहाड़ ही अपनी बाएं हाथ की छोटी उंगली पर उठा लिया था। अतिवृष्टि और बाढ़ से बचने के लिए ब्रजवासियों ने अपनी पशु संपदा के साथ सपरिवार इस पर्वत के नीचे रहकर जान बचायी थी। तब से गोवर्धन पूजा मनाने का प्रचलन है। इस दिन विशेष रूप से भगवान कृष्ण की पूजा भी होती है।

गोवर्धन पूजा करने से क्या फल मिलता है

गोवर्धन पूजा पर गायों को स्नान कराकर उन्हें सजाया जाएगा। नए वस्त्र, सिंग में तेल आदि लगाकर नई रस्सी, नई घंटी के साथ उनकी पूजा होगी। गाय के गोबर से गोवर्धन बनाकर पूजा की जाएगी। गोवर्धन पूजा गायों और अन्न उत्पादन में उसके वंश (गौवंश) के योगदान को बताती है। इसके लिए प्रातःकाल गाय के गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है, जिसे अनेक स्थानों पर मनुष्याकार बनाकर पुष्पों, लताओं आदि से सजाया जाता है। खास कर प्रदोष काल संध्या के समय यह पूजा होगी। पूजा के बाद गोवर्धन जी की सात परिक्रमाओं को करते हुए उनकी जयकार लगाई जाती है। परिक्रमा के समय एक व्यक्ति हाथ में जल का लोटा व अन्य खील (जौ) लेकर चलते हैं। पंडित रामदेव बताते हैं कि गोवर्धन पूजा करने से धन, धान्य, संतान और गोरस की वृद्धि होती है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा की भी पूजा की जाती है।

क्या है गोवर्धन पूजा का धार्मिक महत्व

गोवर्धन पूजा का संबंध सीधे भगवान श्रीकृष्ण की लीला से है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा न करके गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए कहा। इससे क्रोधित होकर इंद्र ने गोकुल पर भारी बारिश की। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की। यह पूजा अहंकार पर भक्ति और प्रकृति की शक्ति की विजय का प्रतीक है। इस दिन गाय माता की भी विशेष पूजा होती है।

इसके अलावा इस महापर्व को अन्नकूट उत्सव भी कहा जाता है, जिसमें नए अनाज और सब्जियों से विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं और भोग के रूप में अर्पित किए जाते हैं।

क्यों चढ़ाया जाता है 56 तरह का भोग?

गोवर्धन पूजा पर भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग चढ़ाने की परंपरा बेहद पुरानी है। ऐसी मान्यता है कि जब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया था, तब उन्होंने लगातार सात दिनों तक ब्रजवासियों की रक्षा की। इस दौरान उन्होंने अन्न और जल ग्रहण नहीं किया। माता यशोदा अपने बाल कृष्ण को दिन में आठ पहर भोजन कराती थीं। जब सात दिन बाद इंद्र का क्रोध शांत हुआ, तो ब्रजवासियों और माता यशोदा को यह चिंता हुई कि कृष्ण सात दिनों तक भूखे रहे।

इसलिए उन्होंने सातों दिन के आठों पहर के भोजन की भरपाई करने के लिए 56 तरह के व्यंजन बनाए और मुरलीधर को भोग लगाया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि भक्त अपनी भक्ति और प्रेम को प्रकट करने के लिए भगवान श्री कृष्ण को 56 तरह के भोग बनाकर चढ़ाते हैं।

क्या है 56 तरह के भोग का लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन 56 भोग चढ़ाने से भक्तों के घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती। इसके साथ ही जीवन में शुभता आती है और भगवान कृष्ण खुश होते हैं।