March 8, 2026

करवाचौथ की किस समय होगी पूजा, किस दिन मनाया जाएगा, पढ़िए

Faridabad/Alive News: सुहागनों को महापर्व करवाचौथ हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सुहागन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती है। इसके अलावा कुंवारी कन्या भी मनचाहा वर पाने के लिए इस व्रत को रखती है। इस दिन माता करवा की पूजा करने के साथ चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य देने के साथ पूजा करने का विधान है। ये व्रत आमतौर पर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में धूमधाम से मनाया जाता है। 

कब है करवाचौथ 2025

  • कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ- 09 अक्टूबर को देर रात 10 बजकर 54 मिनट पर 
  • कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का समापन- 10 अक्टूबर को शाम 7 बजकर 38 मिनट पर 
  • करवा चौथ पूजन का मुहूर्त – 05 बजकर 09 मिनट तक 

करवाचौथ 2025 पर चंद्रमा कब होगा उदय

पंचांग के अनुसार 10 अक्टूबर को शाम 8 बजकर 10 मिनट पर होगा।

 क्या है शुभ योग

इस साल करवाचौथ पर सिद्धि योग के साथ कई शुभ योग का निर्माण हो रहा है। इस दिन चंद्रमा शुक्र की राशि वृषभ में रहेंगी। ऐसे में पूजा करने से शुभ फल की प्राप्ति हो सकती है। सिद्धि योग सुबह से लेकर 5 बजकर 41 मिनट तक रहेंगा। इसके साथ ही शिववास योग का भी संयोग है, जिससे पूजा का आपको दोगुना फल मिल सकता है।

क्या है पूजा विधि

करवाचौथ के दिन महिलाओं को ब्रह्म मुहूर्त में उठाकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाना चाहिए। इसके बाद सरगी का सेवन करें, जो कि व्रत का शुरुआत मानी जाती है। सरगी के बाद देवी-देवताओं का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प ले। करवाचौथ की मुख्य पूजा शाम के समय की जाती है। पूजा के लिए सबसे पहले एक चौकी पर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें साथ ही एक करवा का चित्र भी रखें। पूजा की शुरुआत भगवान शिव की आराधना से करें। उन्हे सफेद चंदन, फूल, माला और भोग अर्पित करें। इसके बाद माता पार्वती को सिंदूर, रोली, कुमकुम, चुनरी और सोलह श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें। गणेश जी की विधिवत पूजा करें। फिर घी का दीपक जलाएं, धूप दे और करवाचौथ की व्रत कथा सुने या पढ़े। इसके बाद एक टोंटीदार करवा से और उसमें गेहूं या चावल रखे। करवा की टोंटी में कांस की सींक लगा दे अब इस करवे की पूरी श्रद्धा और विधि के साथ पूजा करें। पूजा पूर्ण होने के बाद चंद्रमा को अर्ध्य अपिर्त कर व्रत का पारण करें। 

क्यो मनाया जाता है करवाचौथ 

करवाचौथ की परंपरा देवताओं के समय से चली आ रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार देवताओं और दानवों में युद्ध शुरू हो गया और उस युद्ध में देवताओं की हार होने लगी। भयभीत देवता ब्रह्मदेव के पास गए और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। ब्रह्मदेव ने कहा कि इस संकट से बचने के लिए सभी देवताओं की पत्नियों को अपने-अपने पतियों के लिए व्रत रखना चाहिए और सच्चे दिल से उनकी विजय की कामना करनी चाहिए।

ब्रह्मदेव ने यह वचन दिया कि ऐसा करने पर इस युद्ध में देवताओं की जीत निश्चित हो जाएगी। ब्रह्मदेव के इस सुझाव को सभी ने स्वीकार किया। ब्रह्मदेव के कहे अनुसार कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी देवताओं की पत्नियों ने व्रत रखा और अपने पति की विजय के लिए प्रार्थना की।

उनकी यह प्रार्थना स्वीकार हुई और युद्ध में देवताओं की जीत हुई। इस खुशखबरी को सुन कर सभी देव पत्नियों ने अपना व्रत खोला और खाना खाया। उस समय आकाश में चांद भी निकल आया था। माना जाता है कि इसी दिन से करवा चौथ के व्रत की परंपरा शुरू हुई।

क्या है करवाचौथ व्रत का महत्व

 इस व्रत में भगवान शिव शंकर, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्र देवता की पूजा का विधान है। व्रत वाले दिन कथा सुनना बेहद जरूरी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि करवाचौथ की कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है, उनके घर में सुख, शांति,समृद्धि आती है और सन्तान सुख मिलता है। महाभारत में भी करवा चौथ के महात्म्य के बारे में बताया गया है।

भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को करवा चौथ की कथा सुनाते हुए कहा था कि पूरी श्रद्धा और विधि-पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं। श्री कृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रौपदी ने भी करवा-चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही पांचों पांडवों ने महाभारत के युद्ध में विजय हासिल की।