Faridabad/Alive News : सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय मेले में झूलों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यह पहली बार नहीं है जब मेले में झूले की वजह से हादसा हुआ हो। इससे पहले भी दो बार झूला हादसे हो चुके हैं, जिनमें एक व्यक्ति की जान जा चुकी है। इसके बावजूद शनिवार को एक और जानलेवा हादसा सामने आया, जिसने मेला अधिकारियों द्वारा किए जा रहे सुरक्षा दावों की पोल खोल दी है।
नियमों के मुताबिक, मेले में झूले लगाने के लिए हरियाणा पर्यटन विभाग और मेला प्राधिकरण की ओर से कड़े दिशा-निर्देश तय किए जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर के इस आयोजन में झूलों का आवंटन ई-टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है। झूले लगाने से पहले उनकी मजबूती और तकनीकी जांच मैकेनिकल इंजीनियर या संबंधित सरकारी एजेंसी द्वारा की जाती है, जिसके बाद फिटनेस सर्टिफिकेट जारी होता है। इसके अलावा अग्निशमन विभाग से एनओसी और विद्युत निरीक्षक द्वारा बिजली कनेक्शन व वायरिंग की जांच भी अनिवार्य है।
दर्शकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए झूला संचालक के पास थर्ड पार्टी इंश्योरेंस होना जरूरी होता है। किसी भी दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे की जिम्मेदारी झूला संचालक की होती है। नियमों के अनुसार, हर झूले के बाहर उसकी ऊंचाई, आयु सीमा और सुरक्षा निर्देश हिंदी व अंग्रेजी में लिखे होने चाहिए। साथ ही झूला क्षेत्र में प्राथमिक चिकित्सा किट और आपातकालीन स्टॉप बटन की व्यवस्था भी अनिवार्य है।
मेला नोडल अधिकारी हरविंद्र सिंह यादव के अनुसार, जिला उपायुक्त कार्यालय की ओर से झूलों की जांच के लिए एक तकनीकी कमेटी गठित की जाती है, जो झूलों के संचालन से पहले और बाद में नियमित निरीक्षण करती है। हादसे के बाद जिस स्थान पर झूला लगा था, वहां फॉरेंसिक टीम ने भी जांच शुरू कर दी है।
तकनीकी कमेटी का कहना है कि सभी आवश्यक नियमों का पालन किया गया था, लेकिन हादसा कैसे हुआ, इसकी सच्चाई जांच के बाद ही सामने आ सकेगी। यह भी पता लगाया जाएगा कि किस स्तर पर चूक हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
जिला उपायुक्त आयुष सिन्हा ने मामले को गंभीरता से लेते हुए उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। माना जा रहा है कि इस जांच के बाद उन अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी, जिन पर झूलों की रोजाना जांच की जिम्मेदारी थी।

