October 1, 2026

होर्मुज संकट के बीच भारत-यूएई के बीच समुद्र में तेल पाइपलाइन की तैयारी, 88% कच्चा तेल आयात करता है भारत

भारत-यूएई के बीच समुद्र के नीचे तेल पाइपलाइन परियोजना

New Delhi/Alive News: होर्मुज संकट के बीच भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक रास्तों पर काम कर रहा है। इसी कड़ी में भारत और यूएई के बीच समुद्र के नीचे तेल और गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना पर काम तेज किया जा रहा है। इसका उद्देश्य पश्चिम एशिया से भारत तक ऊर्जा की सप्लाई के लिए समुद्री जहाजों पर निर्भरता कम करना है।

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने यूएई के विदेश व्यापार मंत्री थानी बिन अहमद अल जेउदी से मुलाकात के बाद इस परियोजना को लेकर जानकारी दी। सरकार ने ओमान और यूएई से भारत तक समुद्र के नीचे पाइपलाइन बिछाने की परियोजना को प्राथमिकता में रखा है।

MEIDP यानी मिडिल ईस्ट टू इंडिया डीप-वॉटर पाइपलाइन के तहत पाइपलाइन ओमान और यूएई के तट से शुरू होकर अरब सागर के नीचे से गुजरात और महाराष्ट्र के तट तक पहुंच सकती है। परियोजना के जरिए तेल और गैस की सीधी आपूर्ति भारत तक पहुंचाने की संभावना पर अध्ययन किया जा रहा है।

पहले केवल गैस पाइपलाइन की थी योजना

शुरुआत में इस परियोजना में केवल गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना थी। जून में सरकार की ओर से इसे निजी क्षेत्र की परियोजना बताया गया था। अब इसमें कच्चे तेल की आपूर्ति की संभावना को भी शामिल किया गया है।

पेट्रोलियम मंत्रालय के निर्देश पर सरकारी कंपनियां परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही हैं। इसमें पाइपलाइन की लागत, गहरे समुद्र में इसे बिछाने की तकनीक, सुरक्षा और रखरखाव जैसे मुद्दों का अध्ययन किया जाएगा।

भारत को क्यों है वैकल्पिक रास्ते की जरूरत?

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी चुनौतियों के बीच भारत ऊर्जा आपूर्ति के लिए वैकल्पिक रास्ते तैयार करना चाहता है।

भारत को मिलने वाली आधे से ज्यादा LPG और LNG की आपूर्ति भी कतर और यूएई जैसे देशों से समुद्री मार्ग के जरिए होती है। ऐसे में किसी भी लंबे समय तक चलने वाले व्यवधान का असर ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है।

3,450 मीटर गहराई में पाइपलाइन बिछाना चुनौती

परियोजना के सामने सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती समुद्र में करीब 3,450 मीटर की गहराई तक पाइपलाइन बिछाना है। इतनी गहराई में पानी का दबाव काफी अधिक होता है।

इसके अलावा समुद्र तल की चट्टानों और गहरी खाइयों के बीच पाइपलाइन का सुरक्षित रास्ता तैयार करना, उसे नुकसान से बचाना और भविष्य में उसकी मरम्मत करना भी बड़ी चुनौती होगी।

जहाजों पर निर्भरता कम करने की कोशिश

यदि यह परियोजना सफल होती है तो ओमान, यूएई, कतर और सऊदी अरब से तेल और गैस की आपूर्ति पाइपलाइन के जरिए सीधे भारत तक पहुंचाने का विकल्प मिल सकता है। इससे समुद्री जहाजों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

पाइपलाइन के जरिए परिवहन होने से लंबे समय में तेल और गैस की ढुलाई तथा बीमा से जुड़ी लागत में कमी आने की संभावना है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में अचानक बढ़ोतरी होने पर भारत की ऊर्जा आपूर्ति को कुछ हद तक सुरक्षा मिल सकती है।

3 किलोमीटर पाइपलाइन का परीक्षण

परियोजना से जुड़ी संस्था साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज ने करीब 25 करोड़ रुपये की लागत से लगभग 3 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाकर इसका परीक्षण किया है।

परियोजना से जुड़ी सभी जरूरी तकनीकी और अन्य शर्तें पूरी होने के बाद पूरी पाइपलाइन के निर्माण में करीब 5 से 7 साल लगने का अनुमान है। फिलहाल विस्तृत तकनीकी अध्ययन और परियोजना रिपोर्ट तैयार करने का काम किया जा रहा है।