हरियाणा में नकली और घटिया गुणवत्ता वाली दवाओं का कारोबार केवल कानून-व्यवस्था या स्वास्थ्य विभाग की प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि आम आदमी की जिंदगी से जुड़ा बेहद गंभीर सवाल है। जिस दवा को लोग बीमारी से लड़ने और जीवन बचाने की उम्मीद में खरीदते हैं, अगर वही दवा उनकी सेहत के लिए खतरा बन जाए तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? प्रदेश में छह महीने के दौरान दवाओं के 11 सैंपल सब-स्टैंडर्ड मिलना और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ 64 मामलों में एफआईआर दर्ज होना इस समस्या की गंभीरता को उजागर करता है।एक अप्रैल से 30 सितंबर 2026 के बीच हरियाणा में 2,389 दवाओं के नमूने लिए गए, जिनमें से 2,189 की जांच पूरी हुई। इनमें 11 नमूने निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप नहीं पाए गए। आंकड़ा भले ही कुल जांचे गए नमूनों के मुकाबले छोटा दिखाई दे, लेकिन दवाओं के मामले में गुणवत्ता की मामूली चूक भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। खासकर तब, जब संबंधित दवा किसी गंभीर बीमारी के उपचार में इस्तेमाल हो रही हो। सवाल यह भी है कि शेष 200 नमूनों की जांच कब तक पूरी होगी और बाजार में उपलब्ध संदिग्ध दवाओं की निगरानी किस तरह की जा रही है?इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू नकली दवाओं का संगठित कारोबार है। करीब 70 लाख रुपये मूल्य के नकली वजन घटाने और डायबिटीज नियंत्रित करने वाले मौनजारो इंजेक्शन की जब्ती इस बात का प्रमाण है कि मुनाफाखोरों के हौसले कितने बुलंद हैं। वहीं, बीपी नियंत्रित करने वाली टेल्मा-एएम दवा का नकली निर्माण और बिक्री करने वाले अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश बताता है कि यह समस्या किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं है। फरीदाबाद में नकली प्रोपलीन ग्लाइकोल की बड़ी खेप पकड़ा जाना भी दवा निर्माण की आपूर्ति श्रृंखला में मौजूद खामियों की ओर संकेत करता है।स्वास्थ्य विभाग और खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) की कार्रवाई निश्चित रूप से सराहनीय है। पुलिस के साथ 376 स्थानों पर संयुक्त छापेमारी और एफआईआर दर्ज करना इस दिशा में सक्रियता दर्शाता है। लेकिन केवल छापेमारी और मुकदमे दर्ज करने से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। असली चुनौती दोषियों को सजा दिलाने, नकली दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला तोड़ने और ऐसी इकाइयों को दोबारा कारोबार शुरू करने से रोकने की है। अदालतों में 462 मामलों का लंबित होना भी न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने की जरूरत बताता है। 15 मामलों के फैसलों में आठ आरोपियों को सजा मिलना सकारात्मक है, लेकिन बाकी मामलों का शीघ्र निपटारा भी जरूरी है।सरकार को दवा निर्माण से लेकर थोक और खुदरा बिक्री तक पूरी व्यवस्था की नियमित निगरानी करनी चाहिए। लाइसेंस जारी करने के साथ-साथ निर्माण इकाइयों, गोदामों और मेडिकल स्टोर का औचक निरीक्षण भी अनिवार्य होना चाहिए। दवाओं के प्रत्येक बैच की गुणवत्ता जांचने, डिजिटल ट्रैकिंग व्यवस्था विकसित करने और संदिग्ध दवाओं की तत्काल बाजार से वापसी सुनिश्चित करने की जरूरत है। आम लोगों को भी केवल सस्ती कीमत या आकर्षक पैकेजिंग देखकर दवाएं नहीं खरीदनी चाहिए।स्वास्थ्य मंत्री आरती सिंह राव का जीरो टॉलरेंस का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब कार्रवाई आंकड़ों और बयानों से आगे बढ़कर जमीन पर दिखाई दे। दवा कारोबार में मुनाफा कमाना अपराध नहीं, लेकिन लोगों की जिंदगी की कीमत पर मुनाफा कमाना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता। सरकार की प्राथमिकता केवल नकली दवाएं पकड़ना ही नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें नकली दवा बाजार तक पहुंच ही न सके। आखिर दवा जीवन बचाने का माध्यम है, ना कि जीवन को खतरे में डालने के लिये है।
हरियाणा में नकली दवाओं का खतरा, जिंदगी से खिलवाड़ पर सख्ती जरूरी

