November 6, 2026

सांसों पर संकट: आखिर कब जागेंगे हम?

दीपावली खुशियों, रोशनी और उल्लास का पर्व है। यह त्योहार अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है, लेकिन विडंबना देखिए कि जिस त्योहार का इंतजार लोग सालभर करते हैं, उसकी दस्तक के साथ ही उत्तर भारत की हवा में जहर घुलने लगा है। हरियाणा से लेकर दिल्ली-एनसीआर तक प्रदूषण का बढ़ता स्तर एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बन गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों में देश के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में हरियाणा के 7 शहरों का शामिल होना इस बात का संकेत है कि हालात अब सामान्य नहीं रह गए हैं। जब वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई 300 के पार पहुंचता है, तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं होता, बल्कि लाखों लोगों के स्वास्थ्य पर मंडराते खतरे की चेतावनी होता है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर साल सर्दियों की शुरुआत होते ही हमारी हवा जहरीली क्यों हो जाती है? इसका जवाब किसी एक कारण में नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक लापरवाही में छिपा है। खेतों में पराली जलाना, औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुआं, वाहनों का बढ़ता दबाव, सड़कों की धूल, निर्माण कार्यों में नियमों की अनदेखी और कचरे को खुले में जलाने जैसी गतिविधियां प्रदूषण को लगातार बढ़ा रही हैं। मौसम में बदलाव और हवा की गति धीमी होने के कारण प्रदूषक तत्व वातावरण में जमा होने लगते हैं। नतीजतन, शहरों के ऊपर धुएं और धूल की एक जहरीली चादर फैल जाती है।इसका सबसे भयावह असर आम आदमी की सेहत पर दिखाई देता है। सांस लेने में परेशानी, अस्थमा, खांसी, आंखों में जलन और गले में संक्रमण जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ती हैं। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से खतरनाक है। चिंता की बात यह है कि प्रदूषण का असर केवल कुछ दिनों तक नहीं रहता, बल्कि लंबे समय तक फेफड़ों, हृदय और शरीर के दूसरे अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। सवाल यह भी है कि क्या स्वच्छ हवा में सांस लेना अब आम नागरिक के लिए एक विलासिता बनता जा रहा है?ऐसे हालात में सरकारों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। दिल्ली-एनसीआर में लागू ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) को केवल कागजों और सरकारी बैठकों तक सीमित रखने से काम नहीं चलेगा। प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों पर सख्त निगरानी, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, सड़कों की नियमित सफाई, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना और पराली प्रबंधन के प्रभावी विकल्प उपलब्ध कराना समय की मांग है। किसानों को केवल दोषी ठहराने के बजाय उन्हें ऐसी तकनीक और आर्थिक सहायता देनी होगी, जिससे पराली जलाने की मजबूरी समाप्त हो सके।लेकिन बड़ा सवाल यह भी है, क्या सारी जिम्मेदारी सरकार की ही है? बिल्कुल नहीं। नागरिकों को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। छोटी दूरी के लिए निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल, कचरा न जलाना, पेड़-पौधों का संरक्षण और प्रदूषण फैलाने वाली आदतों में बदलाव जरूरी है। दीपावली पर पटाखों से दूरी बनाना भी इसी जिम्मेदारी का हिस्सा है। त्योहार मनाने का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी खुशियों की कीमत दूसरों की सेहत से वसूलें।दरअसल, हमें दीपावली के अर्थ को नए सिरे से समझने की जरूरत है। रोशनी का यह पर्व किसी के घर में धुआं भरने या किसी मासूम बच्चे की सांसें छीनने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। आतिशबाजी के शोर और धुएं के बजाय दीपों, आपसी प्रेम और सद्भाव से त्योहार मनाना कहीं अधिक सार्थक है।आज जरूरत केवल प्रदूषण पर चिंता जताने की नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने की है। सरकार, प्रशासन, उद्योग, किसान और आम नागरिक—सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। क्योंकि स्वच्छ हवा किसी एक सरकार की उपलब्धि या किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार और साझा दायित्व है।पाठकों यह भी याद रखिए, दीपावली के दीप तभी सार्थक हैं, जब हमारे घरों में रोशनी के साथ हमारे फेफड़ों तक स्वच्छ हवा भी पहुंचे। आखिर हमें ऐसी दीपावली चाहिए, जिसमें दीये जलें, न कि सांसें कमजोर पड़े।