लेखक- तिलक राज शर्मा
प्रतिस्पर्धा के इस दौर में कोचिंग संस्थान देश और प्रदेश के शैक्षणिक परिदृश्य का एक ऐसा अभिन्न अंग बन चुके हैं, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना देखने वाले लाखों युवा हर साल इन संस्थानों की शरण में जाते हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से यह क्षेत्र बिना किसी सख्त नियमन के व्यावसायिक मंडी के रूप में उभरा है, उसने न केवल शिक्षा के मूल उद्देश्यों पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि छात्रों के जीवन और सुरक्षा को भी जोखिम में डाला है। इसी पृष्ठभूमि में हरियाणा सरकार द्वारा राज्य के निजी कोचिंग संस्थानों के लिए कड़े दिशानिर्देश और सरकारी पोर्टल पर अनिवार्य पंजीकरण की व्यवस्था लागू करने का फैसला बेहद सामयिक, व्यावहारिक और जनहितैषी कदम रहा है।
हाल ही में देश के विभिन्न हिस्सों से कोचिंग सेंटरों में अग्निकांड, बेसमेंट में पानी भरने की दुर्घटनाओं और अत्यधिक दबाव के कारण छात्रों द्वारा उठाए जाने वाले आत्मघाती कदमों जैसी खबरें लगातार आती रही हैं। हरियाणा में भी कई कस्बों और शहरों में सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर तंग गलियों और अवैध भवनों में कोचिंग सेंटर संचालित हो रहे थे। ऐसे में सरकार का यह निर्णय कि अब हर कोचिंग संस्थान को अनिवार्य रूप से एक समर्पित सरकारी पोर्टल पर पंजीकृत होना होगा और अग्नि सुरक्षा, संरचनात्मक मजबूती, पर्याप्त स्थान व निकास मार्गों के प्रमाण पत्र देने होंगे, सीधे तौर पर छात्रों की जिंदगी से जुड़ा मामला है।
इस नीति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह केवल भौतिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक और वित्तीय पारदर्शिता पर भी बल देती है। अकसर देखा गया है कि ये संस्थान भ्रामक विज्ञापनों, शत-प्रतिशत सफलता के झूठे दावों और अत्यधिक फीस वसूल कर अभिभावकों की गाढ़ी कमाई लूटते हैं। जब छात्र दबाव महसूस करते हैं या बीच में पढ़ाई छोड़ना चाहते हैं, तो फीस वापसी की कोई पारदर्शी नीति न होने के कारण अभिभावक असहाय महसूस करते हैं। नए नियमों के तहत संस्थानों को अपने शुल्क ढांचे, संकाय की योग्यता, और सुविधाओं का पारदर्शी ब्यौरा देना अनिवार्य होगा। इससे शिक्षा बाजार में फल-फूल रही मुनाफाखोरी पर अंकुश लगेगा और अभिभावकों का शोषण बंद होगा।
मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक दबाव का पहलू इस पूरे परिदृश्य में सबसे संवेदनशील है। घंटों तक चलने वाली कक्षाएं, नियमित मूल्यांकन का बोझ और असफलता का डर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है। सरकार द्वारा कोचिंग सेंटरों के लिए परामर्शदाता की व्यवस्था अनिवार्य करना तथा अध्ययन के घंटों को सीमित करने का सुझाव एक संवेदनशील सोच को दर्शाता है।
हालांकि, किसी भी कानून या नीति की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन में निहित होती है। कागजों पर नियम बना देना आसान है, लेकिन धरातल पर उनकी निगरानी करना असल चुनौती है। नौकरशाही और लाल फीताशाही के कारण कहीं यह व्यवस्था कोचिंग संचालकों के लिए केवल ‘एनओसी’ हासिल करने का एक और दरवाजा न बन जाए, इस पर सरकार को कड़ी नजर रखनी होगी। पारदर्शी ऑनलाइन ट्रैकिंग और नियमित औचक निरीक्षण के जरिए ही यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि मानक केवल फाइलों तक सीमित न रहें। राज्य सरकार का यह कदम शिक्षा के व्यावसायीकरण को पूरी तरह रोकने का दावा भले न करे, लेकिन यह ‘छात्र-हित’ और ‘सुरक्षा’ को प्राथमिकता देने की दिशा में एक ठोस और साहसिक शुरुआत अवश्य मानी जा रही है। शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतियोगी परीक्षाओं को पास कराना नहीं, बल्कि युवाओं को एक सुरक्षित और स्वस्थ माहौल में आगे बढ़ने का अवसर देना है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस नकेल से कोचिंग उद्योग में जवाबदेही तय होगी और हरियाणा के हजारों छात्रों को एक सुरक्षित, पारदर्शी और तनावमुक्त शैक्षणिक वातावरण मिल सकेगा।

