दीपों की चमक में घुले अपनापन और प्रकृति का स्पंदन
लेखक- तिलक राज शर्मा
दीपों का पर्व दीपावली भारतीय संस्कृति का वह प्राण-तत्त्व है, जो हर वर्ष हमारे जीवन में नई ऊर्जा, उमंग और सकारात्मकता लेकर आता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या वापसी की स्मृति में मनाया जाने वाला यह पर्व केवल घरों को रोशन करने का उत्सव नहीं है, बल्कि यह अज्ञान, द्वेष और निराशा के अंधकार को मिटाकर ज्ञान, प्रेम और भाईचारे का प्रकाश फैलाने का संदेश देता है। हालांकि, समय के साथ इस पावन पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है, जिसके कारण आज इसके सामने कुछ गंभीर चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं।
आज के भौतिकवादी युग में दीपावली धीरे-धीरे भव्यता, दिखावे और उपभोक्तावाद की भेंट चढ़ती जा रही है। बाजारवाद ने इस पारंपरिक पर्व को एक ऐसे कमर्शियल उत्सव में बदल दिया है जहां आपसी मेल-मिलाप की जगह औपचारिकताएं अधिक नजर आती हैं। इसके साथ ही, भारी आतिशबाजी और प्लास्टिक की सजावट ने हमारी पर्यावरण व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुंचाई है। दीपावली की अगली सुबह आसमान में छाने वाला धुएं का गुबार और कानों के परदे फाड़ने वाला शोर इस बात की गवाही देता है कि हमने उत्सव के नाम पर प्रकृति का कितना दोहन किया है। यह समय आत्ममंथन करने का है कि क्या हम अपने उल्लास के लिए अपनी ही आने वाली पीढ़ियों का भविष्य दांव पर लगा रहे हैं?
दीपावली का मूल संदेश सामाजिक सौहार्द और एकता का प्रतीक है। यह वह अवसर है जब समाज की तमाम दूरियों और ऊंचाइयों को दरकिनार कर हर दिल एक-दूसरे के करीब आता है। जब तक हम अपने पड़ोसियों, वंचितों और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को अपनी खुशियों में शामिल नहीं करते, तब तक दीपोत्सव अधूरा है। सच्ची दीपावली तब मनती है जब हम किसी भूखे को भोजन दें, किसी बेसहारा के चेहरे पर मुस्कान लाएं और पुरानी कड़वाहटों को भुलाकर गले मिलें। “दीपक से दीपक जले” की तर्ज पर यह पर्व हमें सिखाता है कि किस प्रकार हम अपने भीतर के अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर एक समरस और सशक्त समाज का निर्माण कर सकते हैं।
पर्यावरण संरक्षण आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। भगवान श्रीराम ने प्रकृति के सान्निध्य में जीवन बिताया और प्रकृति का हमेशा सम्मान किया। ऐसे में, उनके आदर्शों के विपरीत जाकर प्रकृति को प्रदूषित करना उनके सिद्धांतों की अवहेलना है। इस दीपावली हमें ‘हरित दीपावली’ का संकल्प लेना होगा। पटाखों की तेज गड़गड़ाहट और जहरीले धुएं से तौबा कर हमें मिट्टी के दीयों, प्राकृतिक फूलों और रंगोली से घर सजाने चाहिए। स्थानीय कुम्हारे और कारीगरों के बनाए दीये खरीदकर हम उनकी दीवाली को भी रोशन कर सकते हैं।
दीपावली केवल बाहरी रोशनी का नहीं, बल्कि आंतरिक उजाले का पर्व है। जब तक हमारे मन के भीतर ईर्ष्या, क्रोध और द्वेष का अंधेरा रहेगा, तब तक बाहर के लाखों दीये भी हमारे जीवन को रोशन नहीं कर सकते। आइए, इस दीपावली हम यह दृढ़ संकल्प लें कि हम परंपरा और आधुनिकता का ऐसा संतुलन बनाएंगे जहां आपसी सौहार्द की गर्माहट हो, दिलों का अपनापन हो और प्रकृति का पावन स्पंदन हो। जब समाज और पर्यावरण दोनों सुरक्षित व प्रसन्न होंगे, तभी हमारे घरों में दीपोत्सव का असली और सार्थक प्रकाश जगमगाएगा।
(लेखक अलाईव न्यूज के संस्थापक हैं)

