Noida/Alive News: क्षेत्र कभी कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। पार्टी के विधायक और सांसद दोनों यहां चुने जाते थे। कार्यकर्ताओं की भीड़ और झंडे हर गली में दिखते थे, लेकिन 1990 के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। संगठन भी कमजोर हुआ।
वहीं, पार्टी में उचित सम्मान न मिलने के कारण कई बड़े और जमीनी नेता एक-एक कर दूसरे दलों में चले गए। वह दूसरे प्रदेशों में जाकर विधायक बने। यहां कांग्रेस रसातल में चली गई। पार्टी की अब एनसीआर में पैर जमाने की नई कोशिश है।
संगठन सृजन अभियान शुरू
इसके लिए गौतमबुद्ध नगर से वापसी की लड़ाई शुरू होगी। संगठन सृजन अभियान शुरू किया गया है। इसकी बागड़ोर आंध्र प्रदेश के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष व पूर्व सांसद शेख मस्तान वली को सौंपी है। वह बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद कर गुटबाजी और पार्टी के रसातल में पहुंचने की जमीनी हकीकत जानेंगे।
वहीं, दल छोड़कर गए नेताओं की भरपाई के लिए नए और विश्वसनीय चेहरे तलाशने के साथ दशकों की गुटबाजी को खत्म कर एकजुट संगठन खड़ा करने की कोशिश होगी। निर्णायक बैठक 11 अगस्त को होगी।
लेकिन कांग्रेस यह जान चुकी है कि अगर अब नहीं संभले तो मौका हाथ से निकल जाएगा।
कई नेता छोड़ गए पार्टी
बता दें कि बीते सालों में पश्चिमी उप्र के संगठन पर ऐसे कांग्रेसियों का नियंत्रण हो गया, जिन्होंने पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर अपने करीबियों को आगे बढ़ाया। नोएडा के जोगिंदर अवाना की पार्टी में उपेक्षा हुई तो उन्होंने बसपा का दामन थाम, राजस्थान से चुनाव लड़ा और विधायक बने। पार्टी को मजबूती देने वालों में शुमार डाक्टर महेंद्र नागर सपा में व राजेंद्र अवाना भाजपा में चले गए।
मिल्क किंग के नाम से मशहूर थे चौधरी वेदराम
नोएडा पूर्व में दादरी विधानसभा के नाम से थी। यहां से पूर्व मंत्री लखीराम नागर व रघुराज सिंह मामूली अंतर से हारें। लखीराम नागर बसपा में चले गए। भाजपा के राज्यसभा सदस्य सुरेंद्र नागर के पिता और मिल्क किंग के नाम से मशहूर स्वर्गीय चौधरी वेदराम नागर गुर्जर समाज के बड़े नेता थे। उनका कद इतना बड़ा था कि वह प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनाव लड़वाते थे।

