Faridabad/Alive News: देवउठनी एकादशी के अगले दिन यानी 2 नवंबर (रविवार) को तुलसी विवाह का आयोजन पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ किया जाएगा। तुलसी विवाह को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु, जो चार माह के शयन के बाद जागते हैं, उनका विवाह तुलसी देवी (वृंदा) के साथ संपन्न होता है।

बाबा सिंहेश्वर नाथ मंदिर के पुजारी रुद्रनाथ ठाकुर बताते हैं कि तुलसी विवाह का आयोजन शाम के समय पारंपरिक रीति-रिवाजों से किया जाएगा। पहले तुलसी जी की मंगनी, फिर फेरे और आरती के साथ विवाह संपन्न होगा। इस दिन उपवास रखकर तुलसी विवाह में शामिल होने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। तुलसी विवाह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह समाज में प्रेम, एकता और पारिवारिक सौहार्द का संदेश भी देता है।
मां चंडिका मंदिर के पुजारी पंडित मनोज राय बताते हैं कि देवउठनी एकादशी के अगले दिन देव उठान द्वादशी को माता तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के शालीग्राम स्वरूप से विधिपूर्वक संपन्न कराया जाता है।तुलसी विवाह घर-परिवार में सुख, समृद्धि और सौभाग्य को बढ़ाने वाला है। तुलसी विवाह से घर में सकारात्मक उर्जा का संचार होता है।
यह त्योहार आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में संतुलन, सफलता और आंतरिक शांति का अनुभव होता है। कार्तिक शुक्ल पक्ष में सुबह साढ़े सात बजे से द्वादशी तिथि प्रारंभ होगी और यह अगले दिन, यानी सोमवार, 3 नवंबर को शुभ मुहूर्त सुबह पांच बजे तक माना गया है।

