March 7, 2026

बच्चों पर सोशल मीडिया का बढ़ता असर — ज़रूरत है समझदारी और संतुलन की

आज की पीढ़ी मोबाइल और इंटरनेट के दौर में जन्मी है। पढ़ाई, मनोरंजन, जानकारी सब कुछ अब सोशल मीडिया के ज़रिये उनकी उंगलियों पर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुविधा बच्चों के लिए वरदान साबित हो रही है या धीरे-धीरे उनके मानसिक और सामाजिक विकास पर असर डाल रही है?

भारत में जनवरी 2024 तक लगभग 46.2 करोड़ सोशल मीडिया यूज़र हैं, जिनमें बड़ी संख्या किशोरों और स्कूली बच्चों की है। ग्रामीण इलाकों में भी अब सोशल मीडिया पहुंच चुका है ASER (वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट) 2024 के अनुसार, 14 से 16 वर्ष के 76% किशोर स्मार्टफोन का उपयोग सोशल मीडिया के लिए करते हैं। इसका मतलब है कि सोशल मीडिया अब शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हर वर्ग और हर इलाके में बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है।

सीखने का माध्यम, पर सीमाओं में
सोशल मीडिया ने बच्चों के सामने ज्ञान की नई दुनिया खोली है। शैक्षणिक वीडियोज़, साइंस और आर्ट ट्यूटोरियल्स, कोडिंग और भाषा सीखने के प्लेटफॉर्म ने उनकी सीखने की गति बढ़ाई है। कई बच्चे सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी रचनात्मकता दुनिया के सामने रख पा रहे हैं — यह एक सकारात्मक बदलाव है।

लेकिन इसके साथ ही एक चिंताजनक पहलू भी है। WHO की 2024 रिपोर्ट बताती है कि लगभग 11% किशोर सोशल मीडिया के “अत्यधिक या समस्यात्मक उपयोग” के लक्षण दिखाते हैं। लगातार तुलना, लाइक और फ़ॉलोअर्स की होड़ बच्चों में आत्मसम्मान की कमी और तनाव बढ़ा रही है।

स्क्रीन की चमक में धुंधला होता संतुलन

सोशल मीडिया की आदत का असर नींद और ध्यान पर भी देखा जा रहा है। देर रात तक फोन चलाना बच्चों की नींद छीन रहा है, जिससे पढ़ाई पर सीधा असर पड़ता है। Common Sense Media (2025) के अध्ययन के अनुसार, छोटे बच्चों में औसतन 2.5 घंटे रोज़ स्क्रीन टाइम पाया गया है जबकि विशेषज्ञ 1 घंटे से ज़्यादा की सलाह नहीं देते।

UNICEF की 2025 रिपोर्ट यह भी बताती है कि सिर्फ स्क्रीन-टाइम ही नुकसान का कारण नहीं है, बल्कि कंटेंट की गुणवत्ता और सोशल प्रेशर ज़्यादा हानिकारक होते हैं। यानी बच्चे क्या देख रहे हैं, किससे जुड़ रहे हैं यह अधिक महत्वपूर्ण है।

क्या कर सकते हैं माता-पिता और स्कूल
माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका आज पहले से कहीं ज़्यादा अहम है। बच्चों से खुले दिल से बातचीत करें वे क्या देख रहे हैं, क्या सोचते हैं, क्या डर या परेशानी महसूस करते हैं।

स्क्रीन-टाइम की सीमा तय करें और रात में मोबाइल को बेडरूम से बाहर रखें। सोशल मीडिया की प्राइवेसी सेटिंग्स और सुरक्षा विकल्पों की जानकारी रखें। स्कूलों में “डिजिटल वेल-बीइंग” और “साइबर सेफ्टी” पर नियमित सत्र हों। सबसे ज़रूरी माता-पिता खुद बच्चों के सामने संतुलित सोशल मीडिया उपयोग का उदाहरण बनें।

सोशल मीडिया बच्चों के लिए ज्ञान, संवाद और रचनात्मकता का मंच है, परंतु वही मंच यदि नियंत्रण से बाहर हो जाए, तो मानसिक असंतुलन, अकेलापन और तुलना की जाल में बच्चे फँस सकते हैं। आंकड़े चेतावनी देते हैं कि अब समय आ गया है जब हम सोशल मीडिया के उपयोग को वर्जित नहीं, बल्कि संवेदनशील और शिक्षित तरीके से नियंत्रित करना सीखें।

बच्चों को सिर्फ “स्क्रीन से दूर” रखना समाधान नहीं, बल्कि उन्हें यह सिखाना ज़रूरी है कि स्क्रीन के भीतर क्या देखना है और कैसे देखना है। तभी सोशल मीडिया उनके भविष्य को चमकदार बनाएगा, न कि धुंधला।