Faridabad/Alive News: लोक आस्था के महापर्व छठ का आज दूसरा दिन है। आज खरना है. 28 अक्टूबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही ये पर्व संपन्न होगा। इस महापर्व को लेकर कई कथाएं और कहानियां प्रचलित हैं। इस महापर्व की एक कहानी सूर्यपुत्र कर्ण से भी जुड़ी हुई है।
छठ का महापर्व चल रहा है। ये महापर्व भगवान सूर्य और छठी मैया को समर्पित है। आज इस महापर्व का दूसरा दिन है। आज खरना है। कल अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य को अर्घ्य दिया जाएगा। चौथे दिन यानी अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा, जिसके बाद ये महापर्व संपन्न होगा। इस महापर्व को लेकर कई कथाएं और कहानियां प्रचलित हैं। इस महापर्व की एक कहानी सूर्य पुत्र कर्ण से भी जुड़ी हुई है।
कर्ण की गिनती महाभारत के महान योद्धाओं में होती है। कर्ण की की बहादुरी, दानवीरता और धर्म के प्रति आस्था से आज भी लोग प्रेरणा लेते हैं। कर्ण सूर्यदेव के पुत्र थे। माता कुंति ने सूर्य देव के मंत्रों का जाप किया था। माता कुंती ने सूर्य मंत्र के जाप से कर्ण को जन्म दिया था, लेकिन समाज से डरकर कुंती ने कर्ण को नदी में बहा दिया। कर्ण में सूर्य देव का आशीर्वाद और दिव्यता थी।
कर्ण का पूर्वजन्म भी सूर्य देव के प्रति समर्पित था
कर्ण का पूर्वजन्म भी सूर्य देव के प्रति समर्पित था। बताया जाता है कि कर्ण पूर्णजन्म में एक असुर थे। उनका नाम दंभोद्भवा था। दंभोद्भवा को सूर्य देव ने 1000 कवच और दिव्य कुंडल प्रदान किए थे, जो उसकी रक्षा करते थे। वरदान की वजह से दंभोद्भवा खुद अजर अमर समझने लगा था और अत्याचार करने लगा था। तब नर और नारायण ने बारी-बारी से तपस्या करके दंभोद्भवा के 999 कवच तोड़ दिए।
सूर्य देव ने दिया था ये वरदान
जब उस असुर के पास सिर्फ एक कवच शेष रह गया तो वो जाकर सूर्य लोक में छिप गया था। सूर्य देव ने उसकी भक्ति को देखकर उसे वरदान दिया कि वो अगले जन्म में उनका पुत्र होगा। इसके बाद जब कर्ण बड़े हुए तो उनकी मित्रता दुर्योधन से हुई, जिसने उनको अंग देश दे दिया। अंग देश का क्षेत्र वर्तमान बिहार के भागलपुर और मुंगेर के आसपास था। यही वो स्थान जहां कर्ण ने पहली बार छठ पूजा देखी।
कर्ण ने की थी छठ पूजा
कर्ण सूर्यपुत्र थे, इसलिए छठ पूजा का महत्व जानकर उन्होंने रोजाना सुबह सूर्य नमस्कार करना और सूर्य को अर्घ्य देना शुरू किया, साथ ही वो छठी मैया की स्तुति भी किया करते थे। इस तरह से महाभारत काल में बिहार और पूर्वांचल को छठ पूजा की परंपरा स्थाई रूप से मिली और इसके माध्यम बने कर्ण।

