International/Alive News: हिमालय के ग्लेशियरों पर सिर्फ बढ़ते तापमान का असर नहीं पड़ रहा है। हवा में मौजूद कालिख और धूल के महीन कण भी ग्लेशियरों की बर्फ को तेजी से पिघला रहे हैं। गाड़ियों, कोयला आधारित बिजलीघरों, कारखानों, ईंट भट्ठों, घरेलू चूल्हों, जंगलों और खेतों में लगने वाली आग से निकलने वाला ब्लैक कार्बन हवा के साथ ऊंचे पहाड़ों तक पहुंचकर बर्फ पर जम जाता है।
सफेद बर्फ सूरज की रोशनी का बड़ा हिस्सा वापस अंतरिक्ष में भेज देती है, लेकिन कालिख जमने के बाद बर्फ की चमक कम हो जाती है। इससे सतह सूरज की ज्यादा गर्मी सोखती है और पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण का यह संयुक्त असर ग्लेशियरों को कमजोर और अस्थिर बना सकता है।
ब्लैक कार्बन से बढ़ सकता है ग्लेशियरों का बर्फ नुकसान
एक मॉडलिंग अध्ययन के अनुसार, 2007 से 2016 के दौरान हिमालय में ग्लेशियरों के कुल बर्फ नुकसान में दक्षिण एशिया से पहुंचने वाला ब्लैक कार्बन एक-तिहाई तक योगदान दे सकता है। इसका मतलब है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की वजह केवल तापमान बढ़ना नहीं है, बल्कि बर्फ पर जमा प्रदूषण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
पाकिस्तान के औद्योगिक मैदानी इलाकों से निकलने वाली कालिख और खनिज धूल भी हवाओं के जरिए हिमालय के ऊंचे ग्लेशियरों तक पहुंच सकती है। बर्फ पर जमा ये कण उसे गहरा कर देते हैं, जिससे सूरज की ज्यादा ऊर्जा अवशोषित होती है और पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है।
तेजी से पिघलने से फ्लैश फ्लड का खतरा
ग्लेशियर के तेजी से पिघलने से पानी बर्फ की दरारों के जरिए अंदर तक पहुंच सकता है। इससे ग्लेशियर की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। अगर कमजोर ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे आता है तो अचानक तेज बाढ़ यानी फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ सकता है।
ग्लेशियरों के पास बनी झीलों के फटने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) भी आ सकती है। ऐसी बाढ़ कम समय में निचले इलाकों में भारी नुकसान पहुंचा सकती है। नेपाल में हाल की ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ की घटनाओं ने इस खतरे को लेकर चिंता बढ़ाई है। हालांकि किसी खास घटना की सटीक वजह अलग-अलग हो सकती है और हर घटना को केवल कालिख या तापमान से जोड़ना सही नहीं होगा।
प्रदूषण का असर सिर्फ बर्फ की सतह तक सीमित नहीं
ब्लैक कार्बन सूरज की गर्मी सोखकर पहाड़ी क्षेत्रों के वातावरण को भी प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा यह बादलों के बनने और बर्फबारी के पैटर्न पर असर डाल सकता है। इससे कुछ क्षेत्रों में नई बर्फ की मात्रा कम होने की स्थिति बन सकती है।
इस तरह ग्लेशियरों पर दोहरा दबाव पड़ता है। एक ओर पुरानी बर्फ तेजी से पिघलती है और दूसरी ओर उसकी भरपाई के लिए नई बर्फ कम जमा हो सकती है।
वाहन, उद्योग और पराली जलाना बड़े स्रोत
दक्षिण एशिया में ब्लैक कार्बन के प्रमुख स्रोतों में पेट्रोल-डीजल वाहन, कोयला आधारित बिजलीघर, उद्योग, ईंट भट्ठे, लकड़ी और ठोस ईंधन वाले चूल्हे, जंगलों की आग और फसल अवशेष जलाना शामिल हैं।
इन स्रोतों से निकलने वाले महीन कण हवा के साथ लंबी दूरी तय कर सकते हैं। यानी ग्लेशियर से हजारों किलोमीटर दूर पैदा हुआ प्रदूषण भी हिमालय की बर्फ तक पहुंच सकता है।
कालिख कम करने से जल्दी मिल सकता है फायदा
ब्लैक कार्बन के मामले में राहत की एक संभावना भी है। कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में यह वातावरण में काफी कम समय तक रहता है। इसलिए इसके उत्सर्जन को कम करने पर अपेक्षाकृत जल्दी असर दिखाई दे सकता है।
2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण में आई कमी और हिमालय की बर्फ पर उसके प्रभाव का अध्ययन किया गया। अध्ययन में प्रदूषण कम होने के दौरान बर्फ की चमक बढ़ने और कुछ परिस्थितियों में पिघलने की दर में उल्लेखनीय कमी के संकेत मिले।
ग्लेशियरों का पिघलना पूरे दक्षिण एशिया के लिए चिंता
हिमालय के ग्लेशियर भारत समेत दक्षिण एशिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनसे निकलने वाला पानी कई बड़ी नदियों के प्रवाह में योगदान देता है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से शुरुआत में नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन लंबे समय तक यह प्रक्रिया जारी रही तो ग्लेशियरों में जमा बर्फ कम होती जाएगी।
इसका असर भविष्य में पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है। साथ ही GLOF और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है। इसलिए हिमालय के ग्लेशियरों को बचाने के लिए ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के साथ ब्लैक कार्बन और दूसरे वायु प्रदूषकों के उत्सर्जन को कम करना भी जरूरी है।

