Kolkata/Alive News: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की घोषणा की है। इसके बाद यह अपेक्षाकृत कम चर्चित पार्टी अचानक राष्ट्रीय राजनीति में सुर्खियों में आ गई है।
क्या है NCPI पार्टी?
नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) की स्थापना वर्ष 2023 में हुई थी। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार यह एक पंजीकृत राजनीतिक दल है। पार्टी ने त्रिपुरा विधानसभा चुनाव 2023 में हिस्सा लिया था और उसे चुनाव चिन्ह के रूप में “सात किरणों वाली पेन की निब” आवंटित की गई थी।
त्रिपुरा चुनाव में कैसा रहा प्रदर्शन?
स्रोतों के मुताबिक NCPI ने त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चावमानु, कैलाशहर और अंबासा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। हालांकि पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा और किसी भी उम्मीदवार को 550 से अधिक वोट नहीं मिले। तीनों सीटों पर पार्टी को कुल मिलाकर करीब 1,200 वोट प्राप्त हुए थे।
कौन हैं NCPI के अध्यक्ष?
NCPI के राष्ट्रीय अध्यक्ष उत्तिया कुंडू हैं, जो पश्चिम बंगाल से संबंध रखते हैं। राजनीतिक हलकों में उनकी चर्चा पहले भी हो चुकी है। उनकी पत्नी शेवली कुंडू पार्टी की कोषाध्यक्ष हैं और संगठन के वित्तीय मामलों को संभालती हैं।
पार्टी को कितना मिला था चंदा?
चुनाव आयोग में जमा वित्तीय दस्तावेजों के अनुसार, त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी को लगभग 1.13 लाख रुपये का चंदा प्राप्त हुआ था। इसी राशि के आधार पर पार्टी ने चुनावी गतिविधियां संचालित की थीं।
चुनाव के बाद क्यों हो गई थी निष्क्रिय?
पार्टी से जुड़े नेताओं के अनुसार, त्रिपुरा चुनाव के बाद संगठन ज्यादा सक्रिय नहीं रहा। पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव लड़ने की भी योजना बनाई गई थी, लेकिन आर्थिक और संगठनात्मक मतभेदों के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
TMC के बागी सांसदों ने NCPI को ही क्यों चुना?
राजनीतिक जानकारों के अनुसार इसके पीछे संवैधानिक और संसदीय नियम बड़ी वजह हो सकते हैं। दल-बदल विरोधी कानून के तहत यदि कोई सांसद व्यक्तिगत रूप से पार्टी छोड़ता है तो उसकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है।
हालांकि यदि किसी दल के दो-तिहाई सांसद किसी दूसरी पार्टी में विलय कर लेते हैं तो उनकी सदस्यता बची रह सकती है। लोकसभा में TMC के 28 सांसद हैं और बागी गुट 20 सांसदों के समर्थन का दावा कर रहा है, जो दो-तिहाई संख्या से अधिक है।
ऐसे में एक पंजीकृत राजनीतिक दल NCPI में विलय करना सांसदों के लिए कानूनी रूप से सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है।
क्या लोकसभा में मिलेगी अलग पहचान?
स्रोतों के मुताबिक बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर संसद में अलग बैठने और अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता देने की मांग की है। यदि यह मांग स्वीकार होती है तो NCPI को संसद में एक नई राजनीतिक पहचान मिल सकती है।
आगे क्या होगा?
अब सभी की नजर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर टिकी है। यदि बागी सांसदों का विलय मान्य हो जाता है, तो NCPI राष्ट्रीय राजनीति में एक नई भूमिका निभा सकती है। वहीं पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

